महज शख्स नहीं, मुकम्मल और मकबूल शख्सियत थे प्रो. एड. मीर अथहर अली
इस साल की पहली सुबह बड़ी मनहूस खबर लेकर आई, जब पता चला कि अपने आप में एक मुकम्मल शख्सियत कहे जा सकनेवाले प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब हमारे बीच नहीं रहे. जो आया है, वह जाएगा भी, ये संसार और प्रकृति का नियम है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका जाना बेहद अखर जाता है, क्योंकि उनके चले जाने से देश और समाज का काफी बड़ा नुकसान होता है, प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब भी कुछ इसी तरह की शख्सियत थे, जिनके जाने से मुस्लिम कौम के साथ ही देश और समाज का काफी नुकसान हुआ है, ऐसा कहा जा सकता है.
वर्ष १९२४ में जन्मे प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब का बचपन अंजनगांव सुर्जी में गुजरा और बेहतर तालीम की ललक उन्हें अमरावती के मल्टीपर्पज हायस्कूल तक ले आई. साल १८७० में बनी मोहम्मडन हायस्कूल का नाम उस जमाने में मल्टीपर्पज हायस्कूल हो चुका था, जिसे आज हम और आप सायंसकोर हाईस्कूल के नाम से जानते हैं. ब्रिटीशराज के दौरान प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब की तालीम कई अंग्रेज शिक्षकों के जरिए हुई थी, जिसके चलते देखते ही देखते उन्होंने अंग्रेजी में शानदार महारत हासिल कर ली. साथ ही उस जमाने में उर्दू राजकाज की भाषा थी, यानि आम बोलचाल और दैनिक जीवन में उर्दू का प्रयोग जमकर होता था, अत: प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब भी उर्दू से अछूते नहीं थे और उन्होंने इस जबान में भी अपनी शानदार पकड़ हासिल की. यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब के वालिद डॉ. मीर गौहर अली उस जमाने में डॉक्टरी की तालीम हासिल थे, जिस जमाने में पढ़े-लिखे लोग इक्का-दुक्का मिला करते थे. ऐसे में घर से भी उन्हें पढऩे-लिखने को लेकर प्रोत्साहन मिला करता था, इसमें दो राय नहीं.
* अंग्रेजी, उर्दू व पर्शियन में किया था एम.ए.
शालेय शिक्षा पूरी और पदवी हासिल करने के बाद प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने एक के बाद एक तीन बार एम. ए. किया और उर्दू व अंग्रेजी सहित पर्शियन भाषा में स्नातकोत्तर पदवी हासिल की. सबसे बड़ी बात ये है कि उन्होंने केवल इन भाषाओं में डिग्री ही हासिल नहीं की, बल्कि वे इन तीन भाषाओं में बड़े फर्राटे के साथ बात भी करते थे और किसी एक भाषा का प्रयोग करते समय उनसे किसी और भाषा की शब्दावली का प्रयोग नहीं करते थे. मौजूदा समय के खिचड़ी भाषाओं वाले दौर में तो शायद इस बात की कल्पना करना भी बेमानी है. ट्रिपल एमए करने के साथ ही प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने बी.टी. (बैचलर ऑफ टीचिंग) की पदवी हासिल की और महज २३ वर्ष की उम्र में बतौर शिक्षक अपने शानदार जीवन का आगाज किया. ये साल १९४३ था, जब देश बड़े भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था, जहां एक ओर देश में जंगे आजादी को लेकर हलचलें तेज थीं, वहीं दुसरे विश्वयुद्ध के बादल भी घने और काले हो रहे थे. इन सबके बीच मुल्क के बंटवारे के बीज भी बोए जा चुके थे, यानि हर तरफ अफरा-तफरी और संभ्रम का वातावरण. ऐसे वातावरण में प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब के बड़े और छोटे भाई ने बंटवारे के हालात में पाकिस्तान जाने का फैसला लिया, लेकिन प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने अपना मुल्क और अपने बुजूर्गों की मिट्टी को यह कहकर छोडऩे से इंकार कर दिया कि चाहे हम जीएं या मरें, लेकिन जो भी होगा, अपने मुल्क में होगा. प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब को जाननेवाले बताते हैं कि उस समय यदि वे पाकिस्तान गए होते, तो वहां उन्हें आला दर्जे की नौकरी मिली होती और वे शायद किसी यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर के रूप में रिटायर होते, क्योंकि तब पाकिस्तान के हालात बद से बदतर थे और वहां के हुक्मरानों को अपना मुल्क खड़ा करने के लिए शानदार तालीमयाफ्ता लोगों की सख्त जरूरत थी, जिसकी कसौटी पर प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब पूरी तरह से खरे उतरते थे. जिसकी वजह से बंटवारे के समय और बंटवारे के कुछ समय बाद तक प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब को पाकिस्तान की तरफ वहां चले आने की पेशकश मिलती रही, लेकिन वे हर बार ऐसी पेशकश को ठुकराते रहे.
तत्कालीन सीपी एंड बेरार यानि मध्यप्रांत के अकोला, सागर, जबलपुर जैसे अलग-अलग शहरों में महाविद्यालयों में बतौर प्राध्यापक सेवाएं देनेवाले प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने कालांतर में अचलपुर के जगदंबा महाविद्यालय, शिवाजी कला व वाणिज्य, शिवाजी सायंस और शिवाजी कृषि महाविद्यालय में भी अध्यापन का कार्य किया, जिसके बाद वर्ष १९८४ में वे सरकारी नियमानुसार सेवानिवृत्त हो गये. किंतु इस कालावधि में वे पढ़े-लिखे सुशिक्षितों की एक पूरी जमात खड़ी कर चुके थे, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा.
*रिटायरमेंट के बाद बने वकील
अमूमन लोग-बाद रिटायरमेंट को कार्यक्षम जीवन का अंत मान लेते हैं, किंतु यहां पर भी प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब सबसे अलग निकले. जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि उन्हें पढ़ऩे-पढ़ाने का शुरूआत से ही काफी शौक व रूझान रहा, तो पूरा जीवन विद्यार्थियों को पढ़ाने में बिताने के बाद प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब अपने रिटायरमेंट के बाद एकबार फिर विद्यार्थी की भूमिका में आ गए और उन्होंने एलएलबी करने की ना केवल ठानी, बल्कि ६५ वर्ष की आयु में शानदार अंकों के साथ एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए बाकायदा सनद भी हासिल की. प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब को जाननेवाले बताते हैं कि उन्हें अधिकारों और नियमों का उल्लंघन बेहद नापसंद था और ऐसा होने पर वे मामले को अदालत में खींचने से कोई गुरेज नहीं करते थे, चाहे फिर मसला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों ना ले जाना पड़े. उनका स्पष्ट मानना था कि अन्याय को किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जाना चाहिए. वे अपने आस-पास आम लोगों के मौलिक व मूलभूत अधिकारों का हनन होता देख व्यथित हो जाते थे और ऐसे लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए ही वे अपने रिटायरमेंट के बाद वकील बने थे. वकील बनने के बाद उन्होंने अमरावती सहित नागपुर हायकोर्ट व भोपाल हायकोर्ट के बार एसोसिएशन की सदस्यता हासिल की थी, जहां पर वे बाकायदा अलग-अलग मामलों की पेशी और जिरह के लिए जाया भी करते थे. प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब की वकालत में सबसे बड़ी बात ये हुआ करती थी कि फीस लेना तो दूर, कई बार वे खुद अपने मुवक्कील की टायपिंग व अन्य छोटे-मोटे खर्चे अपनी जेब से दिया करते थे. आज के व्यावसायिक दौर में इस बात की भी कल्पना नहीं की जा सकती. ६५ वर्ष की आयु से शुरू हुआ इस अनोखी वकालत का सिलसिला अगले करीब २० साल तक चलता रहा और करीब ८५-८६ साल की उम्र में प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने कोर्ट जाना छोड़ दिया, हालांकि वे अपने घर पर बैठकर लोगों को नि:शुल्क तौर पर कानूनी मशविरा जरूर दिया करते थे.
* सामाजिकता को दी अहमियत
इन सबसे बड़ी बात ये थी अपनी युवावस्था से ही प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब बड़े सामाजिक किस्म के व्यक्ति रहे और समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ कर गुजरने की भावना उनमें हमेशा बनी रही, जिसके तहत उन्होंने अपने समकक्षों के बच्चों को जहां यंग यूथ वेलफेयर एसो. बनाने प्रेरित किया, जिसके तहत कैम्प क्षेत्र में एक लायब्रेरी स्थापित की गई थी. इस लायब्रेरी में सभी बच्चे अपनी उपयोग में लाई जा चुकीं किताबें लाकर रखा करते थे, ताकि समाज के वंचित तबके के बच्चे उन किताबों के जरिए अपनी पढ़ाई कर सकें. वहीं प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने अपने ही जैसे लोगों को साथ लेकर फ्रेंड्स क्लब बनाया था, जिसके सदस्य समाज की विभिन्न जरूरतों पर ध्यान देते हुए उन जरूरतों को अपने हिसाब से पूरा करने पर विचार-विमर्श करने के साथ ही कुछ हद तक प्रयास भी किया करते थे. कुछ इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने देश की राजधानी नई दिल्ली में अथहर अली इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मैनेजमेंट नामक संस्था भी खोली, जो आज भी काम कर रही है. इस संस्था के जरिए आज तक अनेकों विद्यार्थी एमबीए, एमएचए व बीएचए की पदवी प्राप्त करके बाहर निकले हैं तथा हेल्थ व मैनेजमेंट के क्षेत्र में बेहतरीन पदों पर काम कर रहे हैं. समाजसेवा एवं परोपकार की यह भावना प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब के तीनों बेटों डॉ. शारीक अली, आसीफ अली व इरफान अली सहित उनकी बेटी में भी बखूबी उतरी है तथा अली साहब के चारों बच्चे अपने-अपने क्षेत्रों में इसी भावना के साथ काम कर रहे हैं.
*पढऩे-पढ़ाने के साथ ही अपने शौक भी जिंदा रखे
ऐसा नहीं रहा कि प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब केवल किताबी ज्ञान या पढऩे-पढ़ाने तक ही सीमित रह गए. उन्हें फोटोग्राफी के साथ ही वॉलिबॉल व फुटबॉल खेलने का भी काफी शौक रहा. उनके फोटोग्राफी के शौक का अंदाजा तो केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू एक जनसभा में हिस्सा लेने नागपुर आए थे, तो प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब अमरावती से अपना कैमरा लेकर नागपुर केवल इस वजह से गए थे, ताकि वे पं. नेहरू की तस्वीर ले सकें. सबसे बड़ी बात ये रही कि उन्होंने अपने कैमरे से पं. नेहरू की एक-दो शानदार तस्वीरें ली भी, जो आज भी उनके एल्बम की शान बढ़ा रही हैं.
'ना ख्वाहिश की तमन्ना, ना सिला की परवाहÓ, मिर्जा गालिब के इस शेर को अपने जीवन में उसूल की तरह उतार चुके प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब आज भले हमारे बीच हकीकी तौर पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन खुद आगे बढऩे के साथ ही औरों को भी आगे बढ़ाने को लेकर किए गए उनके काम और उनके विचार हमेशा हमारे साथ रहेंगे, इस बात में कोई संदेह नहीं. अल्लाहताला उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमाएं और उनकी रूह को मगफिरत अता फरमाएं, यही दुआ है. आमीन
चंद्रप्रकाश दुबे (सी.पी. दुबे 'असीम')



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