Saturday, September 9, 2017

आरक्षण व्यवस्था का समर्थन करनेवालों से एक सवाल..
मैं चंद्रप्रकाश दुबे अमरावती महाराष्ट्र का निवासी हूं..  जन्म से हिंदू और जाति से ब्राह्मण हूं.. इस सबसे पहले मैं खुद को एक सच्चा भारतीय मानता हूं और भारत के उस संविधान पर मेरी गहरी आस्था है, जो सभी को एक समान दर्जा देकर अपनी अपनी धार्मिक मान्यताओं व आस्थाओं के साथ जीने का अधिकार देता है..
मेरी बच्ची ने कक्षा 10 वीं में 92.40% अंक हासिल किये, तब कहीं जाकर उसे एक अच्छे सायंस कॉलेज में दाखिला मिला...  फिर कक्षा 12 वीं में 88% तथा सीईटी में 132 अंक हासिल किये, तब कहीं जाकर दूसरे राऊंड में गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश हो पाया... सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में गवर्नमेंट कोटे की सीट पर एडमिशन के बावजूद मुझे सालाना 60 हजार रूपये की फीस प्रवेश के समय एकमुश्त अदा करनी पड़ी... वहीं मेरी बेटी के साथ पढ़नेवाले कुछ बच्चों को कम अंकों के साथ प्रवेश मिलने के साथ ही महज तीन चार हजार रूपये के शुल्क पर एडमिशन दी गई, क्योंकि वे जन्म से किसी वर्गविशेष से वास्ता रखते हैं...  यहां ये बहुत विशेष है कि मैं निजी क्षेत्र में नौकरी करता हूं और मेरी बेटी के साथ पढ़नेवाले विशेष किस्म के बच्चों के अभिभावक सरकारी नौकरी में हैं, जिनकी सालाना कमाई मुझे सात आठ गुना अधिक है.
आरक्षण की सीमा यहीं तक होती, तो गनीमत थी..  कम अंकों व कम शुल्क पर प्रवेश के बावजूद विशेष किस्म के बच्चों को एक विशेष सुविधा व सहूलियत दी जा रही है..  उन्हें लायब्रेरी में पहली प्राथमिकता मिलेगी, किताबें पहले उन्हें दी जायेंगी, फिर अगर बची, तो सामान्य बच्चों को मिलेगी...  बच्चों को दी जानेवाली किताबों की संख्या में भी आरक्षण..  विशेष बच्चों को प्रति सेमीस्टर कोई बारह से चौदह संदर्भ ग्रंथ निशुल्क दिये जायेंगे, वहीं सामान्य बच्चों को शुल्क भरकर महज पांच..  इससे ज्यादा की जरूरत है, तो बाजार से खरीदो...  एक बात और निश्चित है कि इतनी सुविधाओं और सहूलियतों के साथ इंजीनियर बनने के बाद भी ये विशेष बच्चे कभी सामान्य नहीं बन पायेंगे, बल्कि विशेष ही बने रहेंगे और नौकरी के समय भी इन्हें पहली प्राथमिकता मिलेगी.
इन सबके पीछे वजह क्या है, तो पांच हजार साल के अन्याय को दूर करना है...
मेरा सीधा सवाल मैंने और मेरी बच्ची ने किसपर और कब कोई अन्याय या अत्याचार किया है, जिसके लिए हम और हमारी पीढ़ी इस तरह लगभग अपमानित होकर दंडित किये जा रहे हैं...  और मेरी बच्ची के साथ पढ़ रहे विशेष बच्चों और उनके अभिभावकों में से कौन किस तरह के अन्याय व अत्याचार का शिकार हुआ है, जिसकी वजह से वे विशेष बने हुए हैं... क्या ये संविधान की उस मूल अवधारणा का उल्लंघन नहीं है, जिसमें सभी भारतीयों को समसमान मानते हुए उन्हें समान अवसर देने की संकल्पना की गई थी.

किसी के पास तर्कपूर्ण जवाब हो तो जरूर दीजिएगा, व्यथा चर्चा में कोई मतलब नहीं.

Wednesday, September 6, 2017


77 साल की उम्र में दिखा रहे मैराथन में दमखम जानराव लोणकर माऊंट आबू की सीधी चढ़ाई पर साढ़े 21 किमी का लगाया फर्राटा, अब जीत चुके 95 मेडल चंद्रप्रकाश दुबे। वर्धा . कहा जाता है कि अगर कुछ करने का हौसला और जज्बा हो, तो उम्र कभी आड़े नहीं आती। इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं यहां के सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी जानराव खुशालराव लोणकर, जो इस समय 77 वर्ष आयु के हैं और उन्होंने हाल ही में प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज् विश्वविद्यालय की ख्याति रखनेवाले माऊंट आबू की सीधी चढ़ाई पर ना केवल साढ़े 21 किलोमीटर की मैराथान दौड़ पूरी की, बल्कि समुद्र सतह से 5 हजार मीटर की ऊंचाई पर आयोजित इस मैराथान में स्वर्ण पदक भी जीता। करीब साढ़े 29 वर्ष की सेवा के बाद पुलिस विभाग से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद एएसआय स्तर के अधिकारी रह चुके जानराव लोणकर ने अपने आपको कृषि, क्रीडा व सामाजिक क्षेत्र के लिए समर्पित कर दिया और इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न शहरों में आयोजित होनेवाली मैराथान दौड़ स्पर्धाओं में हिस्सा लेना शुरू किया। इसमें मिलनेवाली सफलता के साथ ही बढ़ता गया उनका उत्साह और उन्होंने भारत के शहरों सहित मलेशिया व श्रीलंका जैसे देशों में आयोजित मैराथान में हिस्सा लेने के साथ ही क्वालंलपुर में हुए एशियन गेम्स में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने 7.5 किमी की मैराथान में कांस्य पदक हासिल किया। इससे पहले जानराव लोणकर मलेशिया में 5 किमी की मैराथान में स्वर्ण व रजत पदक के साथ ही श्रीलंका में 400 मीटर की फर्राटा दौड़ में कांस्य पदक जीता। विगत तीस सालों से लगातार मैराथान और फर्राटा दौड़ स्पर्धाओं में हिस्सा ले रहे जानराव लोणकर ने अबतक अपना पूरा दम-खम लगाते हुए करीब 95 पदक जीते हैं। सिटी भास्कर के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए जानराव लोणकर ने बताया कि जबतक उनमें दम है, वे ऐसी दौड़ स्पर्धाओं में हिस्सा लेते हैं। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में उन्होंने बताया कि घर में हर कदम पर साथ देनेवाली उनकी धर्मपत्नी सुमन लोणकर के अलावा पुत्र विवेक लोणकर है, जो महाराष्ट्र पुलिस में सेवारत है व इन दिनों हिंगणघाट में बतौर एएसआय पदस्थ हैं। 77 वर्ष की आयु में भी किसी भी युवा को लजा देनेवाली चुस्ती और फूर्ती रखनेवाले जानराव लोणकर ने आज के युवाओं के नाम संदेश देते हुए उन्हें हर तरह के नशे और बुरी आदतों से दूर रहने का आह्वान किया है। इन तमाम उपलब्धियों के साथ ही जानराव लोणकर को इस बात का बेहद अफसोस है कि स्थानीय क्रीडा विभाग सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियों की ओर से उनकी उपलब्धियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। आदर-सत्कार की बात तो दूर, उनके वल्र्ड चैम्पियनशीप में हिस्सा लेने के आवेदनों पर भी ध्यान नहीं दिया गया। जबकि उन्हें पूरा विश्वास है कि यदि उन्हें बुजूर्गों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ली जानेवाली वल्र्ड चैंपियनशीप में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलता है, तो वे देश के लिए कोई ना कोई पदक जरूर ला सकते हैं।

Sunday, September 3, 2017


मुस्लिम परिवार के घर पाँच वर्षों से विराजीत हो रहे श्रीगणेश नन्हें आशिक खान की आस्था के सामने पूरा परिवार नतमस्तक, सर्वधर्म समभाव की वर्धा में जीती जागती मिसाल चंद्रप्रकाश दुबे। वर्धा . कहा जाता है कि बच्चे ईश्वर के सच्चे और वास्तविक प्रतिनिधि होते हैं। इस बात को साबित कर रहा है वर्धा शहर में रहनेवाला एक महज १३ वर्षीय बालक, जो जन्म से मुस्लिम है, किंतु विगत पाँच वर्षों से अपने घर पर गणेशोत्सव के दौरान ना केवल श्री गणेश प्रतिमा की स्थापना करता है, बल्कि उसका पूरा इस काम में उसका साथ देते हुए दस दिनों तक श्री गणेश पूजन व विसर्जन की विधि पूरे भक्तिभाव से करता है। मौजूदा दौर में जहां एक ओर देश मे जाति, धर्म व मजहब के नाम पर हद दर्जे की कट्टरता हावी होती दिखार्ई दे रही है, वहीं दूसरी ओर इस तरह के दृश्य या खबरें रेगिस्तान में शीतल हवा के झोकें की तरह महसूस होती है। मिलीये वर्धा शहर के पुलफैल परिसर निवासी नन्हें बालक आशिक खान मकसूद खान पठान (१३) से, जो अपने घर में विगत ५ वर्षो से विघ्रहर्ता श्रीगणेश की स्थापना कर सर्वधर्म समभाव का संदेश दे रहा है। जानकारी है कि पुलफैल निवासी मकसूद खान पठान के पुत्र आशिक ने ८ वर्ष की आयु में ही श्रीगणेश की स्थापना करने की इच्छा पिता के पास व्यक्त की। इस पर उन्होने भी पुत्र की इच्छा को ध्यान में रखकर जाति धर्म में भेदभाव दूर रखकर उसे प्रोत्साहित किया। प्रथम वर्ष आशिक ने स्वयं ही अपने हाथों से मिट्टी की गणेश प्रतिमा तैयार की निर्माण की और उसे बड़े ही प्यार व भक्तिभाव से उसने घर में स्थापित किया। तब से लेकर अब तक इस परिवार में श्रीगणेशजी की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ स्थापना की जा रही है। १० दिनों तक प्रतिदिन आशिक पूरे भक्तिभाव से श्रीगणेश की पूजा-अर्चना करता है। उनके मकान में एक ओर दरगाह है व दूसरी ओर श्रीगणेशजी की स्थापित की गई मूर्ति है, जो एक तरह से दोनों धर्म के लोगों को एकता का संदेश देती नजर आ रही है। आशिक खान मकसूद खान पठान शहर के शासकीय अभ्यास स्कूल में मराठी माध्यम से कक्षा ७ वीं में अध्ययनरत है और उसके पिता मकसूद खान पठान का परिसर में ही छोटा सा व्यवसाय है, जिसके भरोसे परिवार का गुजरबसर चलता है। अगर वो चाहेगा, तो ताउम्र विराजेंगे श्री गणेश इस प्रतिनिधि के साथ बातचीत में आशिक के पिता मकसूद खान पठान ने बताया कि, जिस उम्र में आशिक ने गणपति बिठाने की बात कही, तब उन्हें लगा कि मानों कोई फरिश्ता उनसे कोई फरमाईश कर रहा है और वे उसे टाल नहीं सके। मकसूद भाई के मुताबिक हम ईश्वर कहें या अल्लाह, बात तो एक ही है। खुदा सभी का है और हर जगह है। अपने बेटे की बात को टालकर वे अपने खुदा को नाराज नहीं करना चाहते थे। क्या आपको आपके सजातीय लोगों और धर्मगुरूओं से इस काम के लिए विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, इस सवाल पर मकसूद खान ने कहा कि शुरूआती दिनों में ऐसा हुआ था, किंतु उन्होंने हरएक को अपने हिसाब और लिहाज से जवाब दिया। आज भी अगर कोई उनसे इस बात पर चर्चा करना चाहता है, तो, वे आज भी हर बात का जवाब देने तैयार हैं। क्या आगे भी यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा या आशिक के बड़े हो जाने के बाद ये सब बंद हो जाएगा, इस सवाल पर मकसूद भाई ने जवाब दिया कि अगर बाप्पा और उसके आशिक की इच्छा रही, तो ये सिलसिला ताऊम्र चलता रहेगा, वे अपनी तरफ से इसमें कभी कोई अड़ंगा नहीं डालेंगे। अगर आशिक की जीवनभर श्रीगणेश प्रतिमा को स्थापना करने की इच्छा रहेगी, तो आगे भी पूरा परिवार इसका पूरा समर्थन करेंगे। पूरी बातचीत के दौरान मकसूद भाई ने कई बार दोहराया कि भगवान सभी के लिए एक हैं, हम उन्हें अपने-अपने हिसाब से बांट रहे हैं। उनके मुताबिक हिंदू या मुसलमान होने से पहले सभी ने एक अच्छा इंसान बनना जरूरी है। नमस्कार अंकल शहर में एक मुस्लिम परिवार में श्री गणेश की प्रतिमा स्थापित किए जाने की खबर मिलने के बाद खबर की तस्दीक करने पुलफैल निवासी पठान परिवार के घर पहुंचने पर जैसे ही नन्हें आशिक खान से मुलाकात हुई, उसने दैनिक भास्कर की टीम का बाकायदा दोनों हाथ जोड़कर कहा नमस्कार अंकल। उसकी विनम्रता कायल होने लायक कही जा सकती है। दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में इस नन्हें बालक ने बताया कि उसे गणेशोत्सव मनाना अच्छा लगता है और बचपन से ही श्री गणेश की प्रतिमा उसे आकर्षित करती रही है। परिवार से मिले साथ से बेहद अभिभूत और उत्साहित आशिक खान को इस बात का मलाल जरूर है कि चुंकि वह गणेश प्रतिमा स्थापित करता है, इसलिए कुछ लोग उसे कुछ अजीब तरह से देखते और छींटाकशीं करते हैं, लेकिन वे ऐसा क्यों करते हैं, यह उसकी समझ से परे है। साथ ही वह जब अपने अब्बू से इस बारे में पूछता है, तो उसके अब्बू उसे ऐसी बातों पर ध्यान ना देने की सलाह देते हैं।

Friday, August 25, 2017

तलाश.... खुशी की....


खुशी.... एक ऐसा शब्द.... जिसकी हर किसी को तलाश है, इसी खुशी के लिए हम सभी नाना जतन करते हैं, हमने इसके लिए दर्जनों तीज त्यौहार सृजित कर रखें हैं, हजारों तरह की सुविधाएं और सहूलियतें खोज ली हैं, पर शायद इन सबके फेर में हम खुशी को कहीं बहुत पीछे छोड़ आए... कहां मिलती है ये खुशी ???? देखिये इन बेहद गरीब और मैले कुचैले बच्चों को.. देखिये इनके मुस्कुराते हुए चेहरों को, शायद आपको इनमें खुशी की एक झलक मिल जाए... किस्सा कुछ ऐसा है कि मौका था गणेशोत्सव पर्व के दौरान गणेश स्थापना के दिन का और मैं हर साल की तरह अपने बच्चों महिमा और प्रगल्भ को लेकर गुरूवार 25 अगस्त को मेरे शहर के सायंसकोर ग्राऊंड पहुंचा, जहां गणेश प्रतिमाएँ विक्री हेतु उपलब्ध होती हैं.. उसी मैदान में शायद घुमंतु समुदाय से वास्ता रखनेवाले ये बच्चे दो रुपये में जनेऊ जोड़ बेच रहे थे. पर चूँकि मैं जनेऊ पहले ही खरीद चुका था, सो मैंने इन बच्चों को मना कर दिया कि मुझे जनेऊ नहीं चाहिए. इसके बाद भी ये टोली हमारे आसपास ही जमी रही और जब मैं अपने बच्चों के लिए सिर पर बांधी जानेवाली गणपति बाप्पा मोरया लिखी हुई केसरिया पट्ट खरीदने लगा, तो इन तीनों बच्चों में से सबसे बड़ेवाले बच्चे ने मुझसे कहा, काका हमें भी दिला दो ना पट्टी. कितनी छोटी सी मांग... हां, मांग ही तो थी, क्योंकि वो खुद्दार बच्चा मुझसे भीख नहीं मांग रहा था, अपने लिये एक छोटी सी खुशी मांग रहा था... ये खुशी शायद मेरी नजर में छोटी थी और उसकी नजर में बहुत बड़ी.. क्योंकि तब सुबह के दस बज रहे थे और बाजार तड़के से सजा हुआ था, ना जाने वह कब से उस पट्टी को अपने सिर पर सजाने की लालसा लिए बैठा था. इसके पहले कि मैं कुछ कहूं, मेरे बच्चों ने ही वो पट्टी खरीदकर उन्हें दी और उसके बाद का नजारा अद्भुत और अभिभूत कर देनेवाला कहा जा सकता है. सबसे बड़े बच्चे ने पहले खुद के माथे पर पट्टी बांध ली, फिर अपने से छोटे दोनों बच्चों को अपने सामने खड़ा कर पट्टी बांधी, बड़े ने मंझले को और मंझले ने छुटके को.. ये पूरा कार्यक्रम होने के बाद उन तीनों के चेहरे पर जो मुस्कान तैरी, शायद उसने मुझे खुशी की गूढ़ और गहन परिभाषा बेहद आसान तरीके से समझा दी.. साथ ही उस समय मेरे बच्चों ने शायद आत्मसंतोष के भाव का अनुभव किया होगा.. शायद इसीलिए कह रहा हूं, क्योंकि मैंने अपने बच्चों पर ये नहीं जाहिर होने दिया कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा काम किया है... और ये वाकई कोई बड़ा काम था भी नहीं, अपितु उनका नैतिक व मानवीय दायित्व था... कुल मिलाकर इस गणेशोत्सव को मैं इस खुशी के लिए याद रखूंगा.

Tuesday, August 22, 2017

Where is will, there is a way


Pt. Sattan Ji at Amravati


Master Blaster Sachin at Amravati


Come On Smile


Rahul Gandhi At Amravati


Rahat Indori at Amvarati


World Envoirment Day


An Open Letter to CM Fadanvis


Marvelous Melghat


Vidarbha Master Chef at Amravati


The Human Face Of Amaravati


Tregady In Mahuli Jahangir Village....


KUSA... Kayanat E Urdu Sher O Adab.. Something about Sharing Love


APJ Kakam.. In memory Of Amravati


Our Itians... Good Job Guys


Dahi Handi With Real Govida at Amravati


The Legend.. R.S. Dadasahab Gawai