ध्येयवेडा-2
ध्येयवेडा शब्द की व्याख्या मैं इससे पहले अपनी एक पोस्ट में कर चुका हूं,अत: आज उस शब्द पर दोबारा चर्चा नहीं. किंतु संक्षेप में इतना ही बता दूं कि ये एक मराठी शब्द है, जिसका अर्थ होता है कि अपने लक्ष्य के प्रति जुनून की हद तक पागल यानि वेडा होना या फिर लक्ष्य यानि ध्येय के लिए पागलपन की हद तक जुनूनी होना.
चलिए आज ऐसे ही एक और पागल से मिलवाता हूं. इनसे मिलीए ये हैं श्री मंगेश ठाकरे जी, जिन्हें लोग इरसाल कहते हैं. कभी पेशे से प्रेस फोटोग्राफर रहे मंगेश ठाकरे जी एक बेहद शानदार और निष्णात पेशेवर फोटोग्राफर हैं. साथ ही कला क्षेत्र के प्रति समर्पित रंगकर्मी भी. इसके अलावा इन्हें समाजसेवा का भी कीड़ा काटा हुआ है, वो भी बहुत जोर से. तो आप इन्हें दिनभर की दौड़भाग के बाद रात गए अमरावती के जिला सामान्य अस्पताल के आस-पास पा सकते हैं. जहां ये रात-बेरात किसी इमरजंसी पेशंट के लिए खून सहित अन्य किसी जरूरी मदद का इंतजाम करते दिखाई दे सकते हैं.
कभी मेरे हमपेशा रहे मंगेश ठाकरे को शुरूआत से मंच के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहा, जिसके चलते ये अक्सर ही किसी ना किसी कार्यक्रम में मंच संचालन के अवसर खोजा करते थे और उन्हें ऐसे मौके मिलते भी थे. जहां से उनका वास्ता रंगमंच और फिल्मी दुनिया के लोगों से हुआ. यहां से हमारे मंगेशजी के इरसाल मंगेश बनने की ओर आगे बढ़े.
वो कहते हैं ना कि जहां चाह, वहां राह, तो ऐसे ही मंगेश ठाकरे को किस्मत ने एक शानदार मौका दिया, जिसे उन्होंने बखूबी लपका भी. शायद किसी कार्यक्रम के दौरान कुछ इवेंट में थोड़े समय का अंतराल बच रहा था, तो आयोजकों ने चुटकुले सुनाने में माहिर मंगेश ठाकरे को मंच पर पेश कर दिया और मात्र दस पंद्रह मिनट के लिए मंच पर भेजे गये मंगेश ठाकरे करीब पैंतालिस पचास मिनट बाद मंच से उतरे. इस बीच समय का भान ना मंगेश ठाकरे को था, ना आयोजकों को और ना प्रेक्षकों को. प्रेक्षक तो बेचारे हंस-हंसकर बेहाल थे, उन्हें होश भी क्या रहता. लेकिन यहां से मंगेश ठाकरे को अपना ध्येय यानि लक्ष्य की दिशा मिल गई.
हमारे यहां विदर्भ में कुछ बेहद खास शब्द हैं, जो हमारे बेहद अपने हैं. इसी वैदर्भीय शब्दकोश का एक शब्द है इरसाल. इसे आप मनमौजी या लहरी भी समझ सकते हैं. मतलब एकदम मस्तराम मस्ती में आग लगे बस्ती में वाला टाईप. तो मंगेश ठाकरे को उनके स्वभाव के अनुरूप पहले से इरसाल कहा जाता था. उस समय वे अमरावती के नमूना परिसर में रहा करते थे. इस परिसर में रहनेवाले को हमारे यहां नमूनेवाला कहा जाता है. अब हिंदी में नमूने का कुछ अलग अर्थ होता है, तो इरसाल के साथ एक और शब्द जुड़ा, जिसके बाद एक नया शब्द सामने आया इरसाल नमूने और आज ये शब्द केवल अमरावती ही नहीं, बल्कि समूचे विदर्भ और महाराष्ट्र में किसी परिचय का मोहताज नहीं.
इरसाल नमूने हकीकत में एक ऐसा एकपात्री प्रयोग है, जिसमें मंगेश ठाकरे करीब 54 अलग-अलग पात्रों की भूमिका निभाते हैं. मजाक नहीं भई. इसमें भी मजे की बात ये है कि इन 54 पात्रों में कोई छोटा बच्चा है, कोई जवान, कोई बुजूर्ग. कोई महिला है तो कोई नवयौवना. कोई हकला है, तो कोई फटाफट बोलनेवाला. इस प्रयोग को लेकर मंगेश ठाकरे मंच पर इरसालवाडी नामक एक काल्पनिक गांव साकार कर देते हैं और प्रयोग शुरू होने के बाद अगले करीब ढाई घंटे तक प्रेक्षक इस इरसालवाडी गांव की यात्रा पर होते हैं, जहां सिरफ और सिरफ हंसने की इजाजत है. इंसानी जज्बात के हर रंग को साकार करनेवाले मंगेश ठाकरे के इस अनूठे गांव में टेंशन का कोई स्थान नहीं है.बोले तो फूल टू मस्ती एन्ड धमाल.
अभी 2 फरवरी को मंगेश ठाकरे के इरसाल नमूने ने अपने सफर के 19 साल पूरे किए. साथ ही इन 19 वर्ष के दौरान उन्होंने अपने इस अनूठे एकपात्री नाटक के कोई 1616 प्रयोग किए हैं. यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. साथ ही ठेठ अमरावतीकर मंगेश ठाकरे को इस बात के लिए भी सलाम किया जा सकता है कि गत वर्ष अपने इस अद्भूत और अनूठे नाटक का एक हजारवां प्रयोग उन्होंने अमरावती को समर्पित करते हुए यहां से संत ज्ञानेश्वर सांस्कृतिक भवन में किया था. लगातार 19 साल तक एक अनूठी संकल्पना के साथ जीना, उस संकल्पना को जिंदा रखना, साथ ही बदलते वक्त के साथ कुछ बदलावों को स्वीकार करते हुए मूल संकल्पना को कायम रखना और सबसे बड़ी बात ये कि प्रेक्षकों की पसंद पर 19 साल लगातार खरा उतरता रहना, ये मेरी नजर में किसी उपलब्धि से कम नहीं.
यूं तो मंगेश ठाकरे की उपलब्धियां और भी हैं. जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि मंगेश ठाकरे रंगमंच और कला क्षेत्र के प्रति दीवानगी रखते हैं, तो भाईसाहब किसी जमाने में सिने फोटोग्राफर या सिनेमाई मीडिया के फोटोग्राफर बनने के लिए मुंबई-पुणे के भी चक्कर काटने लगे थे. किंतु किस्मत में शायद फोटोग्राफर बनना नहीं, बल्कि अभिनेता बनना लिखा था. तो वहां भी मौका अभिनय का ही मिला. वो भी सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और फायर ब्रान्ड तिलस्मी अभिनेता नाना पाटेकर के साथ. भले ही रोल छोटे थे, लेकिन उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ विरूद्ध और नाना पाटेकर व अजय देवगन के साथ प्रकाश झा की अपहरण में काम किया है. हालांकि तब के मंगेश ठाकरे और आज के मंगेश ठाकरे में अब जमीन आसमान का फर्क है. क्योंकि बीच में पेट इतना ज्यादा बढ़ गया है कि आसमान की ओर रहनेवाले सिर पर मौजूद आंखों को जमीन पर रहनेवाले पैर अब दिखाई नहीं देते. ये बात अलग है कि अपने क्षेत्र में शोहरत की बुलंदी पर रहनेवाले मंगेश ठाकरे के पैर आज भी जमीन पर है.
लगातार दौरे पर दौरे और प्रयोग के बाद प्रयोग के बावजूद मंगेश ठाकरे का अमरावती के प्रति प्यार ही है कि रंगमंच को लेकर पुणे जैसे सांस्कृतिक शहर में तमाम अवसर रहने के बावजूद वे अपनी संस्कारधानी और विदर्भ क्षेत्र की सांस्कृतिक राजधानी अमरावती के साथ पहले की तरह जुड़े हुए हैं. नाट्यविधा, रंगमंच और फोटोग्राफी के साथ ही मंगेश ठाकरे का समाजसेवा में खासा योगदान है. अमरावती को रक्तदाताओं का शहर कहा जाता है, जिसमें मंगेश ठाकरे का खून भी शामिल है. इसके अलावा एक और योगदान है उनका, जिसके बारे में अमूमन बहुत कम लोग जानते हैं. मंगेश आज तक कई लोगों को आत्महत्या से परावृत्त करके निराशा की गर्त से लोगों की जिंदगी बचा चुके हैं. अपने हर प्रयोग के अंत में वे लोगों को अपना मोबाईल नंबर बिना किसी लाग-लपेट के दे देते हैं. साथ ही हंसी को जीवन की खुराक बताते हुए लोगों से, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयोग के समय किसानों से आह्वान करते हैं कि अगर जिंदगी में कभी निराश हो जाओ और कोई ऐसा-वैसा विचार दिमाग में आए, तो कोई भी अगला कदम उठाने से पहले एक बार मुझसे बात जरूर करना. इस पहल का सबसे शानदार पहलू ये है कि उन्हें कई फोन आते हैं, जिसमें से कई फोन तो रात-बेरात आते हैं, लेकिन हर फोन रिसीव होता है और इस जरिए कई जिंदगियां बच भी जाती हैं.
मैं परमपिता परमेश्वर से कामना करता हूं कि मंगेश ठाकरे के इरसाल नमूने के जल्द से जल्द 2100 प्रयोग पूरे हों, क्योंकि ऐसा होते ही यह किसी एक व्यक्ति द्वारा पेश किए जानेवाले एकपात्री प्रयोग का रिकार्ड आंकड़ा होगा. मेरी पूरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं. साथ ही मैं ईश्वर से कामना करता हूं कि अपने आप में सतरंगी छटा लिए जीनेवाले मंगेश ठाकरे की रक्तदान सेवा, मरीजसेवा और उनकी अनूठी समाजसेवा का व्रत यूं ही चलता रहे. इस ध्येयवेडा व्यक्ति को सौ-सौ सलाम, हजारों सलाम.

