ध्येयवेडा... हर भाषा में कोई ना कोई ऐसा शब्द होता है, जो अपने-आप में ही एक पूरा उपन्यास होता है और उस शब्द का किसी अन्य भाषा में ठीक उसी तरह सटीक शब्द नहीं मिल पाता. ऐसा ही एक शब्द मराठी शब्दकोश के पास है... ध्येयवेडा.. उस शब्द का हिंदी में मैं अर्थ निकालता हूं, संकल्प समर्पित. ध्येय यानि संकल्प या उद्देश्य और वेडा यानि समर्पित. हालांकि मराठी में वेडा शब्द का अर्थ होता है पागल. ऐसे में सीधी व्याख्या की जा सकती है कि जो व्यक्ति अपने ध्येय, उद्देश्य या संकल्प के प्रति पागलपन या दीवानगी की हद तक समर्पित हो, उसे ध्येयवेडा कहा जा सकता है.
मैं ऐसे ही कुछ ध्येयवेडे लोगों को जानता हूं, जिनके संकल्प और उद्देश्य व्यापक समाजहित में हैं और जो अपने संकल्प और उद्देश्यों के लिए पागलपन की हद तक समर्पित हैं. इन लोगों के लिए अपने संकल्प और उद्देश्यों के सामने पूरी दुनिया बेकार है या यूं भी कहा जा सकता है कि ये लोग अपने संकल्प और उद्देश्यों के बूते इस दुनिया को और अधिक बेहतर बनाने का माद्दा लेकर पागलपन की हद तक जूझ रहे हैं. तो आज से ऐसे ही कुछ दीवानों, पागलों और ध्येयवेडा लोगों की कहानियां...
इस कड़ी में प्रथम पुष्प अर्पित कर रहा हूं मेरे लिए गुरू, उस्ताद और श्रद्धास्थान का दर्जा रखनेवाले पं. शेषधर तिवारी जी के चरणों में. पंडितजी से मेरा परिचय आभासी होकर भी आभासी नहीं है. मुझे याद है कि किसी रोज अचानक मुझे एक अनजान नंबर से फोन आया था और दूसरी ओर से बड़ी रौबदार आवाज ने अपना परिचय पं. शेषधर तिवारी के रूप में देते हुए मुझसे पूछा था कि उन्हें किसी वाट्सएप पर चलनेवाले किसी साहित्यीक या अदबी ग्रुप से मेरा नंबर किसी ने दिया है. वे वाट्सएप पर अपना सुखनवर नामक एक ग्रुप बना रहे हैं और मुझे उस ग्रुप से जोडना चाह रहे हैं, तो क्या वे मुझे उस ग्रुप से जोड़ सकते हैं, अथवा क्या मैं इस ग्रुप से जुडऩा चाहूंगा.
ये मेरे लिए एक नया अनुभव था कि कोई व्यक्ति आपको किसी वाट्सएप ग्रुप पर जोडऩे से पहले बाकायदा पूछे, क्योंकि उस समय कोई भी किसी भी परिचित को अपने किसी भी वाट्सएप ग्रुप पर जोड़ लिया करता था, फिर भले ही वह ग्रुप अगले बंदे के काम का हो अथवा ना हो. पंडितजी की इस अदा ने मुझपर खासा प्रभाव छोड़ा और आगे चलकर मैंने भी इस बात से सीख लेते हुए अपने द्वारा चलाए जानेवाले वाट्सएप ग्रुप में किसी को जोडऩे से पहले सामनेवाले की इजाजत लेने का अलिखित नियम बना लिया.
सुखनवर समूह हिंदुस्तान सहित दुनिया के कुछ अन्य देशों में बसे हिंदी व उर्दू साहित्यकारों का सबसे शानदार मंच है, जहां पर सिर्फ और सिर्फ साहित्य व अदब पर बात होती है. बड़े नित्य नियमानुसार सुखनवर समूह के संस्थापक पं. शेषधर तिवारी जी सहित उनके द्वारा नियुक्त समूह संचालको यानि एडमिन द्वारा समूह के सदस्यों का कुछ नया व शानदार लिखने को लेकर मार्गदर्शन किया जाता है और हर दिन एक से बढ़कर एक गजलें-कविताएं पोस्ट होती रहती हैं. गजल विधा के अलग-अलग मानक, रदीफ, काफिए, बह्र पर काम होता रहता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जहां एक ओर वाट्सएप पर तीन-चार साल बने तमाम अन्य ग्रुप गुजरते वक्त के साथ अपनी उपयोगिता व प्रासंगिकता खो चुके हैं. वहीं 14 अगस्त 2015 को शुरू हुआ सुखनवर अंतरराष्ट्रीय नामक यह समूह अब केवल एक वाट्सएप ग्रुप ही नहीं रहा, बल्कि अदबी दुनिया में एक सबसे सशक्त मंच के रूप में उभरकर सामने आ रहा है और इसके पीछे मेहनत व समर्पण है पं. शेषधर तिवारी जी जैसे ध्येयवेडा व्यक्ति की.
अब मैं पंडितजी को ध्येयवेडा ना कहूं, तो क्या कहूं. जहां एक ओर आज लगभग हर व्यक्ति तरह तरह के वाट्सएप ग्रुप में जुड़ा हुआ है और हर ग्रुप में लगभग दो तिहाई से अधिक अनजान नंबर होते हैं, जिनमें से कोई किसी को नहीं जानता, ठीक उसी समय हमारे पंडितजी करीब 150 साहित्यकारों को ना केवल एक साथ लेकर चल रहे हैं. साथ ही हर कोई एक दूसरे से रूबरू परिचित हो, एक दूसरे की रचनाओं को केवल वाट्सएप पर ही ना पढ़े, बल्कि आमने-सामने बैठकर सुने. इस बात को ध्यान में रखते हुए पंडितजी ने सुखनवर संगम नाम से हकीकत में जमीनी मुशायरों की श्रृंखला शुरू की, जिसके तहत देश के अलग-अलग शहरों में सुखनवर संगम का आयोजन करने की परिपाटी शुरू की गई. इसमें भी यह विशेष है कि जहां एक ओर व्यवसायिक या कमर्शियल मुशायरों में तमाम शायर व कवि मेहनताना प्राप्त करने की एवज में अपनी रचनाएं पढ़ते हैं, वहीं सुखनवर संगम का आयोजन कवियों व शायरों के आपसी आर्थिक सहयोग से होता है और हर कोई इस आयोजन में आर्थिक सहयोग देने के अलावा अपने-अपने आने-जाने का खर्च खुद ही उठाता है. मतलब ध्येयवेडा पं. शेषधर तिवारी जी ने साहित्य के क्षेत्र में एक गंगा बहा दी है.
सुखनवरी के क्षेत्र में उस्तादे मोहतरम का दर्जा हासिल पं. शेषधर तिवारी जी पेशे से आयटी विशेषज्ञ का दर्जा हासिल रखते हैं और उन्होंने सुखनवर समूह को वैश्विक पटल पर स्थापित करने हेतु भी कोई कोर-कसन नहीं छोड़ी है. जिसके तहत बाकायदा अपने पल्ले का पैसा खर्च कर और थोड़ा-बहुत अपने ही जैसे ध्येयवेडे सुखनवरों का सहयोग प्राप्त कर एक वेबसाईट लान्च की गई है, जिसकी सदस्यता पूरी तरह निशुल्क है और सुखनवर समूह में शामिल सदस्य इस मंच पर पहले से तय किये गये कार्यक्रम के अनुरूप अपनी रचना पोस्ट कर सकता है.
आज इस पोस्ट को लिखने का प्रयोजन इतना है कि शनिवार 9 नवंबर को ताजनगरी आगरा में सुखनवर समूह का 13 वां सुखनवर संगम होने जा रहा है. महज डेढ़ से दो वर्ष के भीतर एक के बाद एक तेरह अलग-अलग शहरों में इस तरह के आयोजन करना कोई हंसी-मजाक का विषय नहीं है. साथ ही साथ पंडितजी ने इन आयोजनों को और अधिक व्यापक रूप देते हुए इस मंच को नई प्रतिभाओं के लिए भी खोल दिया है, ताकि प्रस्थापित नामों के साथ ही साहित्य क्षेत्र के नये हस्ताक्षरों को भी अवसर मिले. आज जब साहित्य अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है और बाजारवाद एक तरह से साहित्य पर हावी हो रहा है, जब हमें पं. शेषधर तिवारी जी जैसे ध्येयवेडा लोगों की सख्त जरूरत है.
अब रही मेरी बात कि मुझ जैसे अनपढ़, अनगढ़ और साहित्य व अदब के लिहाज से गंवार व जाहिल आदमी का सुखनवर समूह के साथ क्या और क्यों वास्ता, तो इसका जवाब खुद मुझे नहीं पता, क्योंकि कविता के मामले में मैं टटपुंजिया तुकबंदियों के अलावा कुछ नहीं कर पाता, सुखनवर के शुरूआती दौर में अक्सर मैं किसी धीर-गंभीर चर्चा के बीच लिखने का प्रयास करने के नाम पर अपनी उलूल-जलूल सी तुकबंदियां चेंप दिया करता था, जिन्हें आदरणीय पंडितजी द्वारा आदमखोर व बब्बर शेर का नामकरण दिया गया. बीते चार वर्षों के दौरान अनेकों बार पंडितजी से मोबाईल पर बातचीत हुई है और उन्होंने हमेशा मुझे अपने आशीर्वाद से अनुग्रहित किया है. यद्यपि मैं आज तक उनसे रूबरू कभी नहीं मिल पाया, लेकिन अब ऐसा लगता ही नहीं कि मैं उनसे कभी नहीं मिला. हालांकि उनसे मिलने की प्रबल इच्छा है, क्योंकि सुखनवर समूह ने मुझे जो कुछ दिया है, उसे शब्दों में पूरी तरह से बांध पाना काफी मुश्किल है, जबकि सुखनवर ने मुझे एक से बढ़कर एक शब्द और ख्याल दिये है. इन्हीं ख्यालों में घूमते हुए हिंदी से लेकर उर्दू तक होते हुए मुझे मराठी में एक शब्द मिला.. ध्येयवेडा.. और इस शब्द ने मेरी सोच को एक नई दिशा दी. ऐसे में इस शब्द के साथ शुरू हुई मेरी विचार यात्रा का पहला पड़ाव मैंने पं. शेषधर तिवारी जी के चरणों में ही डालना सबसे उचित जाना है.
ध्येयवेडा शब्द के साथ मेरी विचार यात्रा के पथिक और भी कुछ लोग हैं, जिनकी चर्चा फिर कभी. फिलहाल सुखनवर समूह के आगरा में होनेवाले 13 वें सुखनवर संगम को अनेकानेक साधुवाद. इस आयोजन के लिए पं. शेषधर तिवारी जी के प्रयासों को सैकड़ों हजारों सलाम. साथ ही इस आयोजन का हिस्सा बनने जा रहे सभी सुखनवर साथियों को हार्दिक बधाइया. इसके अलावा हमेशा की तरह इस बात का मलाल कि मैं इस बार भी सुखनवर संगम मुशायरे में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो पा रहा. लेकिन यकीन जानिए कि हमेशा की तरह पूरा दिन रहूंगा वहीं पर ही.
मैं ऐसे ही कुछ ध्येयवेडे लोगों को जानता हूं, जिनके संकल्प और उद्देश्य व्यापक समाजहित में हैं और जो अपने संकल्प और उद्देश्यों के लिए पागलपन की हद तक समर्पित हैं. इन लोगों के लिए अपने संकल्प और उद्देश्यों के सामने पूरी दुनिया बेकार है या यूं भी कहा जा सकता है कि ये लोग अपने संकल्प और उद्देश्यों के बूते इस दुनिया को और अधिक बेहतर बनाने का माद्दा लेकर पागलपन की हद तक जूझ रहे हैं. तो आज से ऐसे ही कुछ दीवानों, पागलों और ध्येयवेडा लोगों की कहानियां...
इस कड़ी में प्रथम पुष्प अर्पित कर रहा हूं मेरे लिए गुरू, उस्ताद और श्रद्धास्थान का दर्जा रखनेवाले पं. शेषधर तिवारी जी के चरणों में. पंडितजी से मेरा परिचय आभासी होकर भी आभासी नहीं है. मुझे याद है कि किसी रोज अचानक मुझे एक अनजान नंबर से फोन आया था और दूसरी ओर से बड़ी रौबदार आवाज ने अपना परिचय पं. शेषधर तिवारी के रूप में देते हुए मुझसे पूछा था कि उन्हें किसी वाट्सएप पर चलनेवाले किसी साहित्यीक या अदबी ग्रुप से मेरा नंबर किसी ने दिया है. वे वाट्सएप पर अपना सुखनवर नामक एक ग्रुप बना रहे हैं और मुझे उस ग्रुप से जोडना चाह रहे हैं, तो क्या वे मुझे उस ग्रुप से जोड़ सकते हैं, अथवा क्या मैं इस ग्रुप से जुडऩा चाहूंगा.
ये मेरे लिए एक नया अनुभव था कि कोई व्यक्ति आपको किसी वाट्सएप ग्रुप पर जोडऩे से पहले बाकायदा पूछे, क्योंकि उस समय कोई भी किसी भी परिचित को अपने किसी भी वाट्सएप ग्रुप पर जोड़ लिया करता था, फिर भले ही वह ग्रुप अगले बंदे के काम का हो अथवा ना हो. पंडितजी की इस अदा ने मुझपर खासा प्रभाव छोड़ा और आगे चलकर मैंने भी इस बात से सीख लेते हुए अपने द्वारा चलाए जानेवाले वाट्सएप ग्रुप में किसी को जोडऩे से पहले सामनेवाले की इजाजत लेने का अलिखित नियम बना लिया.
सुखनवर समूह हिंदुस्तान सहित दुनिया के कुछ अन्य देशों में बसे हिंदी व उर्दू साहित्यकारों का सबसे शानदार मंच है, जहां पर सिर्फ और सिर्फ साहित्य व अदब पर बात होती है. बड़े नित्य नियमानुसार सुखनवर समूह के संस्थापक पं. शेषधर तिवारी जी सहित उनके द्वारा नियुक्त समूह संचालको यानि एडमिन द्वारा समूह के सदस्यों का कुछ नया व शानदार लिखने को लेकर मार्गदर्शन किया जाता है और हर दिन एक से बढ़कर एक गजलें-कविताएं पोस्ट होती रहती हैं. गजल विधा के अलग-अलग मानक, रदीफ, काफिए, बह्र पर काम होता रहता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जहां एक ओर वाट्सएप पर तीन-चार साल बने तमाम अन्य ग्रुप गुजरते वक्त के साथ अपनी उपयोगिता व प्रासंगिकता खो चुके हैं. वहीं 14 अगस्त 2015 को शुरू हुआ सुखनवर अंतरराष्ट्रीय नामक यह समूह अब केवल एक वाट्सएप ग्रुप ही नहीं रहा, बल्कि अदबी दुनिया में एक सबसे सशक्त मंच के रूप में उभरकर सामने आ रहा है और इसके पीछे मेहनत व समर्पण है पं. शेषधर तिवारी जी जैसे ध्येयवेडा व्यक्ति की.
अब मैं पंडितजी को ध्येयवेडा ना कहूं, तो क्या कहूं. जहां एक ओर आज लगभग हर व्यक्ति तरह तरह के वाट्सएप ग्रुप में जुड़ा हुआ है और हर ग्रुप में लगभग दो तिहाई से अधिक अनजान नंबर होते हैं, जिनमें से कोई किसी को नहीं जानता, ठीक उसी समय हमारे पंडितजी करीब 150 साहित्यकारों को ना केवल एक साथ लेकर चल रहे हैं. साथ ही हर कोई एक दूसरे से रूबरू परिचित हो, एक दूसरे की रचनाओं को केवल वाट्सएप पर ही ना पढ़े, बल्कि आमने-सामने बैठकर सुने. इस बात को ध्यान में रखते हुए पंडितजी ने सुखनवर संगम नाम से हकीकत में जमीनी मुशायरों की श्रृंखला शुरू की, जिसके तहत देश के अलग-अलग शहरों में सुखनवर संगम का आयोजन करने की परिपाटी शुरू की गई. इसमें भी यह विशेष है कि जहां एक ओर व्यवसायिक या कमर्शियल मुशायरों में तमाम शायर व कवि मेहनताना प्राप्त करने की एवज में अपनी रचनाएं पढ़ते हैं, वहीं सुखनवर संगम का आयोजन कवियों व शायरों के आपसी आर्थिक सहयोग से होता है और हर कोई इस आयोजन में आर्थिक सहयोग देने के अलावा अपने-अपने आने-जाने का खर्च खुद ही उठाता है. मतलब ध्येयवेडा पं. शेषधर तिवारी जी ने साहित्य के क्षेत्र में एक गंगा बहा दी है.
सुखनवरी के क्षेत्र में उस्तादे मोहतरम का दर्जा हासिल पं. शेषधर तिवारी जी पेशे से आयटी विशेषज्ञ का दर्जा हासिल रखते हैं और उन्होंने सुखनवर समूह को वैश्विक पटल पर स्थापित करने हेतु भी कोई कोर-कसन नहीं छोड़ी है. जिसके तहत बाकायदा अपने पल्ले का पैसा खर्च कर और थोड़ा-बहुत अपने ही जैसे ध्येयवेडे सुखनवरों का सहयोग प्राप्त कर एक वेबसाईट लान्च की गई है, जिसकी सदस्यता पूरी तरह निशुल्क है और सुखनवर समूह में शामिल सदस्य इस मंच पर पहले से तय किये गये कार्यक्रम के अनुरूप अपनी रचना पोस्ट कर सकता है.
आज इस पोस्ट को लिखने का प्रयोजन इतना है कि शनिवार 9 नवंबर को ताजनगरी आगरा में सुखनवर समूह का 13 वां सुखनवर संगम होने जा रहा है. महज डेढ़ से दो वर्ष के भीतर एक के बाद एक तेरह अलग-अलग शहरों में इस तरह के आयोजन करना कोई हंसी-मजाक का विषय नहीं है. साथ ही साथ पंडितजी ने इन आयोजनों को और अधिक व्यापक रूप देते हुए इस मंच को नई प्रतिभाओं के लिए भी खोल दिया है, ताकि प्रस्थापित नामों के साथ ही साहित्य क्षेत्र के नये हस्ताक्षरों को भी अवसर मिले. आज जब साहित्य अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है और बाजारवाद एक तरह से साहित्य पर हावी हो रहा है, जब हमें पं. शेषधर तिवारी जी जैसे ध्येयवेडा लोगों की सख्त जरूरत है.
अब रही मेरी बात कि मुझ जैसे अनपढ़, अनगढ़ और साहित्य व अदब के लिहाज से गंवार व जाहिल आदमी का सुखनवर समूह के साथ क्या और क्यों वास्ता, तो इसका जवाब खुद मुझे नहीं पता, क्योंकि कविता के मामले में मैं टटपुंजिया तुकबंदियों के अलावा कुछ नहीं कर पाता, सुखनवर के शुरूआती दौर में अक्सर मैं किसी धीर-गंभीर चर्चा के बीच लिखने का प्रयास करने के नाम पर अपनी उलूल-जलूल सी तुकबंदियां चेंप दिया करता था, जिन्हें आदरणीय पंडितजी द्वारा आदमखोर व बब्बर शेर का नामकरण दिया गया. बीते चार वर्षों के दौरान अनेकों बार पंडितजी से मोबाईल पर बातचीत हुई है और उन्होंने हमेशा मुझे अपने आशीर्वाद से अनुग्रहित किया है. यद्यपि मैं आज तक उनसे रूबरू कभी नहीं मिल पाया, लेकिन अब ऐसा लगता ही नहीं कि मैं उनसे कभी नहीं मिला. हालांकि उनसे मिलने की प्रबल इच्छा है, क्योंकि सुखनवर समूह ने मुझे जो कुछ दिया है, उसे शब्दों में पूरी तरह से बांध पाना काफी मुश्किल है, जबकि सुखनवर ने मुझे एक से बढ़कर एक शब्द और ख्याल दिये है. इन्हीं ख्यालों में घूमते हुए हिंदी से लेकर उर्दू तक होते हुए मुझे मराठी में एक शब्द मिला.. ध्येयवेडा.. और इस शब्द ने मेरी सोच को एक नई दिशा दी. ऐसे में इस शब्द के साथ शुरू हुई मेरी विचार यात्रा का पहला पड़ाव मैंने पं. शेषधर तिवारी जी के चरणों में ही डालना सबसे उचित जाना है.
ध्येयवेडा शब्द के साथ मेरी विचार यात्रा के पथिक और भी कुछ लोग हैं, जिनकी चर्चा फिर कभी. फिलहाल सुखनवर समूह के आगरा में होनेवाले 13 वें सुखनवर संगम को अनेकानेक साधुवाद. इस आयोजन के लिए पं. शेषधर तिवारी जी के प्रयासों को सैकड़ों हजारों सलाम. साथ ही इस आयोजन का हिस्सा बनने जा रहे सभी सुखनवर साथियों को हार्दिक बधाइया. इसके अलावा हमेशा की तरह इस बात का मलाल कि मैं इस बार भी सुखनवर संगम मुशायरे में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो पा रहा. लेकिन यकीन जानिए कि हमेशा की तरह पूरा दिन रहूंगा वहीं पर ही.



