Wednesday, February 5, 2020


ध्येयवेडा-2
ध्येयवेडा शब्द की व्याख्या मैं इससे पहले अपनी एक पोस्ट में कर चुका हूं,अत: आज उस शब्द पर दोबारा चर्चा नहीं. किंतु संक्षेप में इतना ही बता दूं कि ये एक मराठी शब्द है, जिसका अर्थ होता है कि अपने लक्ष्य के प्रति जुनून की हद तक पागल यानि वेडा होना या फिर लक्ष्य यानि ध्येय के लिए पागलपन की हद तक जुनूनी होना.
चलिए आज ऐसे ही एक और पागल से मिलवाता हूं. इनसे मिलीए ये हैं श्री मंगेश ठाकरे जी, जिन्हें लोग इरसाल कहते हैं. कभी पेशे से प्रेस फोटोग्राफर रहे मंगेश ठाकरे जी एक बेहद शानदार और निष्णात पेशेवर फोटोग्राफर हैं. साथ ही कला क्षेत्र के प्रति समर्पित रंगकर्मी भी. इसके अलावा इन्हें समाजसेवा का भी कीड़ा काटा हुआ है, वो भी बहुत जोर से. तो आप इन्हें दिनभर की दौड़भाग के बाद रात गए अमरावती के जिला सामान्य अस्पताल के आस-पास पा सकते हैं. जहां ये रात-बेरात किसी इमरजंसी पेशंट के लिए खून सहित अन्य किसी जरूरी मदद का इंतजाम करते दिखाई दे सकते हैं.
कभी मेरे हमपेशा रहे मंगेश ठाकरे को शुरूआत से मंच के प्रति जबरदस्त आकर्षण रहा, जिसके चलते ये अक्सर ही किसी ना किसी कार्यक्रम में मंच संचालन के अवसर खोजा करते थे और उन्हें ऐसे मौके मिलते भी थे. जहां से उनका वास्ता रंगमंच और फिल्मी दुनिया के लोगों से हुआ. यहां से हमारे मंगेशजी के इरसाल मंगेश बनने की ओर आगे बढ़े.
वो कहते हैं ना कि जहां चाह, वहां राह, तो ऐसे ही मंगेश ठाकरे को किस्मत ने एक शानदार मौका दिया, जिसे उन्होंने बखूबी लपका भी. शायद किसी कार्यक्रम के दौरान कुछ इवेंट में थोड़े समय का अंतराल बच रहा था, तो आयोजकों ने चुटकुले सुनाने में माहिर मंगेश ठाकरे को मंच पर पेश कर दिया और मात्र दस पंद्रह मिनट के लिए मंच पर भेजे गये मंगेश ठाकरे करीब पैंतालिस पचास मिनट बाद मंच से उतरे. इस बीच समय का भान ना मंगेश ठाकरे को था, ना आयोजकों को और ना प्रेक्षकों को. प्रेक्षक तो बेचारे हंस-हंसकर बेहाल थे, उन्हें होश भी क्या रहता. लेकिन यहां से मंगेश ठाकरे को अपना ध्येय यानि लक्ष्य की दिशा मिल गई.
हमारे यहां विदर्भ में कुछ बेहद खास शब्द हैं, जो हमारे बेहद अपने हैं. इसी वैदर्भीय शब्दकोश का एक शब्द है इरसाल. इसे आप मनमौजी या लहरी भी समझ सकते हैं. मतलब एकदम मस्तराम मस्ती में आग लगे बस्ती में वाला टाईप. तो मंगेश ठाकरे को उनके स्वभाव के अनुरूप पहले से इरसाल कहा जाता था. उस समय वे अमरावती के नमूना परिसर में रहा करते थे. इस परिसर में रहनेवाले को हमारे यहां नमूनेवाला कहा जाता है. अब हिंदी में नमूने का कुछ अलग अर्थ होता है, तो इरसाल के साथ एक और शब्द जुड़ा, जिसके बाद एक नया शब्द सामने आया इरसाल नमूने और आज ये शब्द केवल अमरावती ही नहीं, बल्कि समूचे विदर्भ और महाराष्ट्र में किसी परिचय का मोहताज नहीं.
इरसाल नमूने हकीकत में एक ऐसा एकपात्री प्रयोग है, जिसमें मंगेश ठाकरे करीब 54 अलग-अलग पात्रों की भूमिका निभाते हैं. मजाक नहीं भई. इसमें भी मजे की बात ये है कि इन 54 पात्रों में कोई छोटा बच्चा है, कोई जवान, कोई बुजूर्ग. कोई महिला है तो कोई नवयौवना. कोई हकला है, तो कोई फटाफट बोलनेवाला. इस प्रयोग को लेकर मंगेश ठाकरे मंच पर इरसालवाडी नामक एक काल्पनिक गांव साकार कर देते हैं और प्रयोग शुरू होने के बाद अगले करीब ढाई घंटे तक प्रेक्षक इस इरसालवाडी गांव की यात्रा पर होते हैं, जहां सिरफ और सिरफ हंसने की इजाजत है. इंसानी जज्बात के हर रंग को साकार करनेवाले मंगेश ठाकरे के इस अनूठे गांव में टेंशन का कोई स्थान नहीं है.बोले तो फूल टू मस्ती एन्ड धमाल.
अभी 2 फरवरी को मंगेश ठाकरे के इरसाल नमूने ने अपने सफर के 19 साल पूरे किए. साथ ही इन 19 वर्ष के दौरान उन्होंने अपने इस अनूठे एकपात्री नाटक के कोई 1616 प्रयोग किए हैं. यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. साथ ही ठेठ अमरावतीकर मंगेश ठाकरे को इस बात के लिए भी सलाम किया जा सकता है कि गत वर्ष अपने इस अद्भूत और अनूठे नाटक का एक हजारवां प्रयोग उन्होंने अमरावती को समर्पित करते हुए यहां से संत ज्ञानेश्वर सांस्कृतिक भवन में किया था. लगातार 19 साल तक एक अनूठी संकल्पना के साथ जीना, उस संकल्पना को जिंदा रखना, साथ ही बदलते वक्त के साथ कुछ बदलावों को स्वीकार करते हुए मूल संकल्पना को कायम रखना और सबसे बड़ी बात ये कि प्रेक्षकों की पसंद पर 19 साल लगातार खरा उतरता रहना, ये मेरी नजर में किसी उपलब्धि से कम नहीं.
यूं तो मंगेश ठाकरे की उपलब्धियां और भी हैं. जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि मंगेश ठाकरे रंगमंच और कला क्षेत्र के प्रति दीवानगी रखते हैं, तो भाईसाहब किसी जमाने में सिने फोटोग्राफर या सिनेमाई मीडिया के फोटोग्राफर बनने के लिए मुंबई-पुणे के भी चक्कर काटने लगे थे. किंतु किस्मत में शायद फोटोग्राफर बनना नहीं, बल्कि अभिनेता बनना लिखा था. तो वहां भी मौका अभिनय का ही मिला. वो भी सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और फायर ब्रान्ड तिलस्मी अभिनेता नाना पाटेकर के साथ. भले ही रोल छोटे थे, लेकिन उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ विरूद्ध और नाना पाटेकर व अजय देवगन के साथ प्रकाश झा की अपहरण में काम किया है. हालांकि तब के मंगेश ठाकरे और आज के मंगेश ठाकरे में अब जमीन आसमान का फर्क है. क्योंकि बीच में पेट इतना ज्यादा बढ़ गया है कि आसमान की ओर रहनेवाले सिर पर मौजूद आंखों को जमीन पर रहनेवाले पैर अब दिखाई नहीं देते. ये बात अलग है कि अपने क्षेत्र में शोहरत की बुलंदी पर रहनेवाले मंगेश ठाकरे के पैर आज भी जमीन पर है.
लगातार दौरे पर दौरे और प्रयोग के बाद प्रयोग के बावजूद मंगेश ठाकरे का अमरावती के प्रति प्यार ही है कि रंगमंच को लेकर पुणे जैसे सांस्कृतिक शहर में तमाम अवसर रहने के बावजूद वे अपनी संस्कारधानी और विदर्भ क्षेत्र की सांस्कृतिक राजधानी अमरावती के साथ पहले की तरह जुड़े हुए हैं. नाट्यविधा, रंगमंच और फोटोग्राफी के साथ ही मंगेश ठाकरे का समाजसेवा में खासा योगदान है. अमरावती को रक्तदाताओं का शहर कहा जाता है, जिसमें मंगेश ठाकरे का खून भी शामिल है. इसके अलावा एक और योगदान है उनका, जिसके बारे में अमूमन बहुत कम लोग जानते हैं. मंगेश आज तक कई लोगों को आत्महत्या से परावृत्त करके निराशा की गर्त से लोगों की जिंदगी बचा चुके हैं. अपने हर प्रयोग के अंत में वे लोगों को अपना मोबाईल नंबर बिना किसी लाग-लपेट के दे देते हैं. साथ ही हंसी को जीवन की खुराक बताते हुए लोगों से, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयोग के समय किसानों से आह्वान करते हैं कि अगर जिंदगी में कभी निराश हो जाओ और कोई ऐसा-वैसा विचार दिमाग में आए, तो कोई भी अगला कदम उठाने से पहले एक बार मुझसे बात जरूर करना. इस पहल का सबसे शानदार पहलू ये है कि उन्हें कई फोन आते हैं, जिसमें से कई फोन तो रात-बेरात आते हैं, लेकिन हर फोन रिसीव होता है और इस जरिए कई जिंदगियां बच भी जाती हैं.
मैं परमपिता परमेश्वर से कामना करता हूं कि मंगेश ठाकरे के इरसाल नमूने के जल्द से जल्द 2100 प्रयोग पूरे हों, क्योंकि ऐसा होते ही यह किसी एक व्यक्ति द्वारा पेश किए जानेवाले एकपात्री प्रयोग का रिकार्ड आंकड़ा होगा. मेरी पूरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं. साथ ही मैं ईश्वर से कामना करता हूं कि अपने आप में सतरंगी छटा लिए जीनेवाले मंगेश ठाकरे की रक्तदान सेवा, मरीजसेवा और उनकी अनूठी समाजसेवा का व्रत यूं ही चलता रहे. इस ध्येयवेडा व्यक्ति को सौ-सौ सलाम, हजारों सलाम.

Friday, November 8, 2019

ध्येयवेडा... हर भाषा में कोई ना कोई ऐसा शब्द होता है, जो अपने-आप में ही एक पूरा उपन्यास होता है और उस शब्द का किसी अन्य भाषा में ठीक उसी तरह सटीक शब्द नहीं मिल पाता. ऐसा ही एक शब्द मराठी शब्दकोश के पास है... ध्येयवेडा.. उस शब्द का हिंदी में मैं अर्थ निकालता हूं, संकल्प समर्पित. ध्येय यानि संकल्प या उद्देश्य और वेडा यानि समर्पित. हालांकि मराठी में वेडा शब्द का अर्थ होता है पागल. ऐसे में सीधी व्याख्या की जा सकती है कि जो व्यक्ति अपने ध्येय, उद्देश्य या संकल्प के प्रति पागलपन या दीवानगी की हद तक समर्पित हो, उसे ध्येयवेडा कहा जा सकता है.
मैं ऐसे ही कुछ ध्येयवेडे लोगों को जानता हूं, जिनके संकल्प और उद्देश्य व्यापक समाजहित में हैं और जो अपने संकल्प और उद्देश्यों के लिए पागलपन की हद तक समर्पित हैं. इन लोगों के लिए अपने संकल्प और उद्देश्यों के सामने पूरी दुनिया बेकार है या यूं भी कहा जा सकता है कि ये लोग अपने संकल्प और उद्देश्यों के बूते इस दुनिया को और अधिक बेहतर बनाने का माद्दा लेकर पागलपन की हद तक जूझ रहे हैं. तो आज से ऐसे ही कुछ दीवानों, पागलों और ध्येयवेडा लोगों की कहानियां...
इस कड़ी में प्रथम पुष्प अर्पित कर रहा हूं मेरे लिए गुरू, उस्ताद और श्रद्धास्थान का दर्जा रखनेवाले पं. शेषधर तिवारी जी के चरणों में. पंडितजी से मेरा परिचय आभासी होकर भी आभासी नहीं है. मुझे याद है कि किसी रोज अचानक मुझे एक अनजान नंबर से फोन आया था और दूसरी ओर से बड़ी रौबदार आवाज ने अपना परिचय पं. शेषधर तिवारी के रूप में देते हुए मुझसे पूछा था कि उन्हें किसी वाट्सएप पर चलनेवाले किसी साहित्यीक या अदबी ग्रुप से मेरा नंबर किसी ने दिया है. वे वाट्सएप पर अपना सुखनवर नामक एक ग्रुप बना रहे हैं और मुझे उस ग्रुप से जोडना चाह रहे हैं, तो क्या वे मुझे उस ग्रुप से जोड़ सकते हैं, अथवा क्या मैं इस ग्रुप से जुडऩा चाहूंगा.
ये मेरे लिए एक नया अनुभव था कि कोई व्यक्ति आपको किसी वाट्सएप ग्रुप पर जोडऩे से पहले बाकायदा पूछे, क्योंकि उस समय कोई भी किसी भी परिचित को अपने किसी भी वाट्सएप ग्रुप पर जोड़ लिया करता था, फिर भले ही वह ग्रुप अगले बंदे के काम का हो अथवा ना हो. पंडितजी की इस अदा ने मुझपर खासा प्रभाव छोड़ा और आगे चलकर मैंने भी इस बात से सीख लेते हुए अपने द्वारा चलाए जानेवाले वाट्सएप ग्रुप में किसी को जोडऩे से पहले सामनेवाले की इजाजत लेने का अलिखित नियम बना लिया.
सुखनवर समूह हिंदुस्तान सहित दुनिया के कुछ अन्य देशों में बसे हिंदी व उर्दू साहित्यकारों का सबसे शानदार मंच है, जहां पर सिर्फ और सिर्फ साहित्य व अदब पर बात होती है. बड़े नित्य नियमानुसार सुखनवर समूह के संस्थापक पं. शेषधर तिवारी जी सहित उनके द्वारा नियुक्त समूह संचालको यानि एडमिन द्वारा समूह के सदस्यों का कुछ नया व शानदार लिखने को लेकर मार्गदर्शन किया जाता है और हर दिन एक से बढ़कर एक गजलें-कविताएं पोस्ट होती रहती हैं. गजल विधा के अलग-अलग मानक, रदीफ, काफिए, बह्र पर काम होता रहता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जहां एक ओर वाट्सएप पर तीन-चार साल बने तमाम अन्य ग्रुप गुजरते वक्त के साथ अपनी उपयोगिता व प्रासंगिकता खो चुके हैं. वहीं 14 अगस्त 2015 को शुरू हुआ सुखनवर अंतरराष्ट्रीय नामक यह समूह अब केवल एक वाट्सएप ग्रुप ही नहीं रहा, बल्कि अदबी दुनिया में एक सबसे सशक्त मंच के रूप में उभरकर सामने आ रहा है और इसके पीछे मेहनत व समर्पण है पं. शेषधर तिवारी जी जैसे ध्येयवेडा व्यक्ति की.
अब मैं पंडितजी को ध्येयवेडा ना कहूं, तो क्या कहूं. जहां एक ओर आज लगभग हर व्यक्ति तरह तरह के वाट्सएप ग्रुप में जुड़ा हुआ है और हर ग्रुप में लगभग दो तिहाई से अधिक अनजान नंबर होते हैं, जिनमें से कोई किसी को नहीं जानता, ठीक उसी समय हमारे पंडितजी करीब 150 साहित्यकारों को ना केवल एक साथ लेकर चल रहे हैं. साथ ही हर कोई एक दूसरे से रूबरू परिचित हो, एक दूसरे की रचनाओं को केवल वाट्सएप पर ही ना पढ़े, बल्कि आमने-सामने बैठकर सुने. इस बात को ध्यान में रखते हुए पंडितजी ने सुखनवर संगम नाम से हकीकत में जमीनी मुशायरों की श्रृंखला शुरू की, जिसके तहत देश के अलग-अलग शहरों में सुखनवर संगम का आयोजन करने की परिपाटी शुरू की गई. इसमें भी यह विशेष है कि जहां एक ओर व्यवसायिक या कमर्शियल मुशायरों में तमाम शायर व कवि मेहनताना प्राप्त करने की एवज में अपनी रचनाएं पढ़ते हैं, वहीं सुखनवर संगम का आयोजन कवियों व शायरों के आपसी आर्थिक सहयोग से होता है और हर कोई इस आयोजन में आर्थिक सहयोग देने के अलावा अपने-अपने आने-जाने का खर्च खुद ही उठाता है. मतलब ध्येयवेडा पं. शेषधर तिवारी जी ने साहित्य के क्षेत्र में एक गंगा बहा दी है.
सुखनवरी के क्षेत्र में उस्तादे मोहतरम का दर्जा हासिल पं. शेषधर तिवारी जी पेशे से आयटी विशेषज्ञ का दर्जा हासिल रखते हैं और उन्होंने सुखनवर समूह को वैश्विक पटल पर स्थापित करने हेतु भी कोई कोर-कसन नहीं छोड़ी है. जिसके तहत बाकायदा अपने पल्ले का पैसा खर्च कर और थोड़ा-बहुत अपने ही जैसे ध्येयवेडे सुखनवरों का सहयोग प्राप्त कर एक वेबसाईट लान्च की गई है, जिसकी सदस्यता पूरी तरह निशुल्क है और  सुखनवर समूह में शामिल सदस्य इस मंच पर पहले से तय किये गये कार्यक्रम के अनुरूप अपनी रचना पोस्ट कर सकता है.
आज इस पोस्ट को लिखने का प्रयोजन इतना है कि शनिवार 9 नवंबर को ताजनगरी आगरा में सुखनवर समूह का 13 वां सुखनवर संगम होने जा रहा है. महज डेढ़ से दो वर्ष के भीतर एक के बाद एक तेरह अलग-अलग शहरों में इस तरह के आयोजन करना कोई हंसी-मजाक का विषय नहीं है. साथ ही साथ पंडितजी ने इन आयोजनों को और अधिक व्यापक रूप देते हुए इस मंच को नई प्रतिभाओं के लिए भी खोल दिया है, ताकि प्रस्थापित नामों के साथ ही साहित्य क्षेत्र के नये हस्ताक्षरों को भी अवसर मिले. आज जब साहित्य अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है और बाजारवाद एक तरह से साहित्य पर हावी हो रहा है, जब हमें पं. शेषधर तिवारी जी जैसे ध्येयवेडा लोगों की सख्त जरूरत है.
अब रही मेरी बात कि मुझ जैसे अनपढ़, अनगढ़ और साहित्य व अदब के लिहाज से गंवार व जाहिल आदमी का सुखनवर समूह के साथ क्या और क्यों वास्ता, तो इसका जवाब खुद मुझे नहीं पता, क्योंकि कविता के मामले में मैं टटपुंजिया तुकबंदियों के अलावा कुछ नहीं कर पाता, सुखनवर के शुरूआती दौर में अक्सर मैं किसी धीर-गंभीर चर्चा के बीच लिखने का प्रयास करने के नाम पर अपनी उलूल-जलूल सी तुकबंदियां चेंप दिया करता था, जिन्हें आदरणीय पंडितजी द्वारा आदमखोर व बब्बर शेर का नामकरण दिया गया. बीते चार वर्षों के दौरान अनेकों बार पंडितजी से मोबाईल पर बातचीत हुई है और उन्होंने हमेशा मुझे अपने आशीर्वाद से अनुग्रहित किया है. यद्यपि मैं आज तक उनसे रूबरू कभी नहीं मिल पाया, लेकिन अब ऐसा लगता ही नहीं कि मैं उनसे कभी नहीं मिला. हालांकि उनसे मिलने की प्रबल इच्छा है, क्योंकि सुखनवर समूह ने मुझे जो कुछ दिया है, उसे शब्दों में पूरी तरह से बांध पाना काफी मुश्किल है, जबकि सुखनवर ने मुझे एक से बढ़कर एक शब्द और ख्याल दिये है. इन्हीं ख्यालों में घूमते हुए हिंदी से लेकर उर्दू तक होते हुए मुझे मराठी में एक शब्द मिला.. ध्येयवेडा.. और इस शब्द ने मेरी सोच को एक नई दिशा दी. ऐसे में इस शब्द के साथ शुरू हुई मेरी विचार यात्रा का पहला पड़ाव मैंने पं. शेषधर तिवारी जी के चरणों में ही डालना सबसे उचित जाना है.
ध्येयवेडा शब्द के साथ मेरी विचार यात्रा के पथिक और भी कुछ लोग हैं, जिनकी चर्चा फिर कभी. फिलहाल सुखनवर समूह के आगरा में होनेवाले 13 वें सुखनवर संगम को अनेकानेक साधुवाद. इस आयोजन के लिए पं. शेषधर तिवारी जी के प्रयासों को सैकड़ों हजारों सलाम. साथ ही इस आयोजन का हिस्सा बनने जा रहे सभी सुखनवर साथियों को हार्दिक बधाइया. इसके अलावा हमेशा की तरह इस बात का मलाल कि मैं इस बार भी सुखनवर संगम मुशायरे में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो पा रहा. लेकिन यकीन जानिए कि हमेशा की तरह पूरा दिन रहूंगा वहीं पर ही.



Wednesday, June 19, 2019

शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी देश की मूलभूत सुविधाओं में शामिल होने चाहिए, किंतु दुर्भाग्य से भारत इन दोनों की क्षेत्रों में बुरी तरह पिछड़ा हुआ है. या यूं कहें कि इन दोनों क्षेत्रों को निजी हाथों के जिम्मे सौंपकर आज तक की तमाम सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर एक तरह से लूट-खसोट को अनुमति दे दी है. जी हां, लूट-खसोट ही तो है. चाहे निजी स्कूलें हों या निजी अस्पताल व दवाखाने, आम आदमी की पहुंच से बेहद दूर हैं. वहीं इन्हीं आम आदमियों के लिए बनाए गये सरकारी स्कूलों और सरकारी दवाखानों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का कहीं पता नहीं. ऐसे में आम आदमी जाए, तो कहां जाए. ऐसे ही हालात में किसी समय मगध व पाटलिपुत्र जैसी समृद्ध राजसत्ता तथा तक्षशिला व नालंदा जैसे ज्ञानसंपन्न विश्वविद्यालयों के साक्षी रहे बिहार के मुजफ्फरपुर से दिल दहला देनेवाली ही नहीं, बल्कि आत्मा को झकझोर देनेवाली खबरें आती है, कि किसी चमकी नाम की बीमारी ने करीब डेढ़ सौ बच्चों से उनके जीवन की चमक छीन ली. हर ओर विलाप, हर मिनट एक मौत, हर मौत के बाद मौत, मौत दर मौत और केवल मौत.... उफ्फफ...
सब जानते हैं कि हमारे सरकारी अस्पतालों में क्या होता है, कई बार तो ये अस्पताल भ्रष्टाचार के खुले अड्डे बने होते हैं. दवाईयां यहां होती नहीं, लाखों-करोड़ों की मशीनरी या तो कागज पर आती है और अगर सच में आ भी गई, तो धूल खाती पड़ी रहती है, क्योंकि चलाना किसे आता है, जिसे आता है, वह या तो सही समय पर नहीं आता, या फिर नियुक्ति ही नहीं होती. मरीजों को नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था नहीं मिलती, इन अस्पतालों के शौचालयों और स्वच्छतागृहों का स्वछता से शायद ही कोई नाता होता है. आदि.. आदि.. इत्यादि... बहुत सी बातें हैं, मैं कोई नई बात नहीं बता रहा, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन ना कोई करता है, ना कोई कुछ कहता है.
हम जागते हैं और हड़बड़ाते हैं तब, जब कुछ बड़ा घटित होता है, जैसे कि अब मुजफ्फरपुर में हुआ. तब हम सवाल पूछते हैं कि फलां व्यक्ति कहां है, क्या कर रहा है, यहां ऐसा क्यों नहीं हुआ, यहां तो वैसा होना चाहिए था, आदि.. आदि.. इत्यादि. सबसे बुरी गत होती है हम मीडिया वालों की, ना पहुंचो, तो देखो मीडिया सो रहा है, पहुंच गये, तो देखो लाशों पर गिद्ध की तरह मंडराने चले आए. बोले तो हद है बस. (हालांकि देश के कुछ प्रतिष्ठित पत्रकार तब जागे, जब उन्हें लगा कि दूसरे पत्रकार इस खबर को लेकर टीआरपी में उनसे आगे निकल रहे हैं और इसके बाद मुजफ्फरपुर ने मौत के नंगे नाच के साथ ही स्तरहीन तथा गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता को भी देखा, जिसके लिए मीडिया जगत की हर ओर जबरदस्त किरकिरी हुई.
 मुजफ्फरपुर मामले में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम जी  द्वारा कवर की गई न्यूज में मैं एक डाक्टर की बात सुन रहा था, उस डाक्टर की बदहवासी पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो. डाक्टर साहब अपने इर्द-गिर्द हो रही मौतों से निश्चित ही हैरान-परेशान थे, उन्हें स्पष्ट रूप से कहते हुए सुना जा सकता है कि हमारे पास स्टाफ की कमी है, हमारे पास आवश्यक दवाईयां नहीं है, लेकिन हम अपने पास उपलब्ध साधनों के जरिए भी हर एक बच्चे की जान बचाने की कोशिश में लगे हैं. उन डाक्टर साहब का ये कहते हुए गला रूंध गया था कि सर हम बिना कुछ खाए-पिए काम में लगे हैं, पर क्या करें हमारी भी कुछ सीमा है. हर बात के लिए डाक्टरों का गिरहबान पकडऩेवालों कभी जाकर उन खद्दरधारियों का गिरहबान भी पकड़ो, कभी जाकर उन बड़े-बड़े अफसरान का गिरहबान भी पकड़ो, जिनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे हर एक सरकारी अस्पताल को तमाम जरूरी सुविधाओं से लैस रखें. सांप निकल जाने पर लाठी पीटने से ज्यादा ठीक रहेगा ये शायद. हालांकि इस मामले में एक के बाद एक शानदार कवरेज करने और प्रेसवार्ता में केंद्रीय व राज्य स्वास्थ्य मंत्री को जमकर घेरने के बाद खुद को मिलती प्रशंसा व सफलता के बाद अंजीत अंजुम जी तब भटक गये, जब उन्होंने मृतक बच्चों की गिनती जातिगत स्तर पर करनी शुरू कर दी. ये भी हमारे देश की एक प्रमुख समस्या है, कि हम हर बात में जाति और धर्म देखते ही देखते हैं.
मेरी संवेदनाएं मुजफ्फरपुर के तमाम पीडि़त परिवारों के साथ हैं. साथ ही मेरा गुस्सा उन तमाम लोगों के खिलाफ है, जो इन बच्चों की चिताओं पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकना चाहते हैं और इन मौतों को एक अपने लिए मौकों के रूप में देख रहे हैं. ऐसे लोगों को अपने इंसान होने पर शर्म आनी चाहिए. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि विगत कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि मुजफ्फरपुर सहित कुछ खास घटनाओं पर कुछ खास किस्म के लोग संवेदना जताने की आड़ में या सहानुभूति जताने के नाम पर जले पर नमक छिड़कने तथा जख्मों को कुरेदने का काम कर रहे हैं. साथ ही कुछ लोगों ने तो इसमें भी जाति और धर्म की बात ढूंढ ली. मतलब हद ही है.
यहां पर भी मेरा एक सवाल है कि अगर लीची नामक फल से ही चमकी का बुखार फैला, तो ऐसा इन तमाम शहरों में क्यों नहीं हुआ, जहां लीची खाई जाती है, कहीं मुजफ्फरपुर की लीची में कोई लोचा तो नहीं. मुजफ्फरपुर को एक सबक की तरह लिया जाना चाहिए. सभी जिलों में सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली को मुस्तैद किया जाना बेहद जरूरी है, ताकि कोई भी आपात या ऐसी स्थिति उपजने पर उससे तत्काल निपटा जा सके. याद रखें कि मौत कभी किसी के घर बताकर नहीं आती. गरीबों के इलाज का पैसा खानेवालों को ये ध्यान में रखना चाहिए कि सभी की तरह बच्चे उनके घर में भी होंगे और लीची जरूर खाते होंगे, भगवान ना करे कि कभी कुछ..... खुदा खैर करे.
कुछ सवाल... जिनके जवाब सोचे ही जाने चाहिए... क्योंकि हर सवाल बेहद गंभीर है, और इन सवालों के जवाब में कुछ बेहद अलग तरह के निहितार्थ हैं...
एक आदमी बीच सड़क पर चाहे किसी भी वजह के चलते पुलिस से उलझता है और उलझने के पहले ही दौर में खुद को प्राप्त विशेषाधिकार के चलते अपने पास मौजूद तलवार निकालकर पुलिस कर्मी को धमकाना शुरू करता है.. ये कहां तक सही है?
वह पुलिसकर्मी अपनी रक्षा के साथ ही सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से अपने साथी पुलिसकर्मियों को बुलाता है, क्योंकि सड़क पर खुलेआम धारदार हथियार लहराना भी कानूनन जुर्म है, तो पुलिस का उस व्यक्ति को पकडऩे के लिए आगे बढऩा लाजिमी है. ये गलत कैसे हुआ?
पुलिस के जत्थे को आते देख वह व्यक्ति पुलिस दल की ओर वापिस तलवार लहराता हुआ आगे बढ़ता है, ठीक इसी समय सिविल ड्रेस में मौजूद एक मुस्तैद पुलिसकर्मी उसे धर लेता है और बाकी पुलिसवाले खुद को तलवार के वार से बचाते हुए उसपर लाठी बरसाते हैं. इसमें गलत क्या है?
इसी हाथापायी के दौरान वह व्यक्ति पुलिसवाले की पकड़ से छूटकर नीचे गिरता है और गजब की फूर्ती से उठने के साथ ही पुलिसवाले पर तलवार लहराते हुए झपटता है. तलवार का वार बेहद घातक हो सकता था, अगर पुलिसवाला चौकन्ना नहीं होता तो. क्या उस पुलिसवाले ने उस समय वहीं ढेर या शहीद हो जाना चाहिए था?
इस समय और ठीक इसी समय अबतक बीच-बचाव की कोशिश करनेवाला उस व्यक्ति का बेटा भी पुलिसवाले से मारपीट करना शुरू करता है, लेकिन तब तक और पुलिसवाले उस व्यक्ति के हाथ से तलवार गिराने उस पर लाठी मारते है. क्या ये करना भी गलत था?
वह व्यक्ति लगातार और बुरी तरह उस पुलिसवाले से उलझा हुआ है और दोनों लगातार गुत्थमगुत्था हैं. पुलिसवाला उसे छोड़ नहीं रहा, क्योंकि उस व्यक्ति के सिर पर खून सवार है. इस समय बाकी पुलिसवाले अपने साथी की सुरक्षा निश्चित करने के साथ ही उस आदमी को काबू करने का प्रयास कर रहे है. इसमें गलत क्या था?
इस समय उस व्यक्ति का बेटा अपनी टेम्पो लाकर अपने पिता से उलझे पुलिसवालों से पूरी ताकत के साथ लाकर भिड़ा देता है, जिससे उसके पिता सहित कुछ पुलिसवाले जमीन पर जा गिरते हैं. जिसके बाद कुछ पुलिसवाले उस लड़के को धुन डालते हैं. इसमें गलत या असामान्य क्या है?
इस पूरी घटना के बाद भी दोनों बाप-बेटे काबू में आने को तैयार नहीं, जिसके बाद पुलिस उन दोनों पर जैसे-तैसे काबू पाते हुए उन्हें लगभग घसीटते हुए थाने लेकर जाती है. इसमें गलत और नया क्या है?
इन तमाम सवालों के साथ ही शुरू होता है सवालों का एक और सिलसिला, क्योंकि जितनी सीधी ये कहानी दिख रही है, उतने सीधे तरह से इसे पहले प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि घटनाक्रम के साथ कुछ लोगों ने जमकर छेड़छाड़ की. सबसे पहले कुछ अलग किस्म की सोच और विशेष विचारधारा रखनेवाले लोगों ने सोशल मीडिया पर खबर चलाई कि दिल्ली में कुछ पुलिसवालों ने एक सिख ड्रायवर के साथ अमानवीय मारपीट की, जिसके सबूत के रूप में एक सिख व्यक्ति की चोटिल पीठ के फोटोज पोस्ट किए गये. इन प्रारंभिक पोस्ट में उपरोक्त घटनाक्रम का कोई उल्लेख नहीं था. इसके बाद सामने आया एक वीडियो, जिसमें कुछ पुलिसवाले एक टेम्पो ड्रायवर पर जमकर लाठियां बरसाते नजर आ रहे थे. इस वीडियो को आधार बनाकर उन्हीं सोशल मीडिया वीरों ने कहा कि देखिए, दिल्ली पुलिस की बर्बरता, इसी मारपीट में घायल हुआ है वो सिख ड्रायवर. इस समय तक दिल्ली सहित आस-पास रहनेवाले सिख समुदाय के हर व्यक्ति के पास यही दो मैसेज दनादन पहुंचे, जिसके बाद उनका खून उबलना लाजिमी था.
लेकिन यू-टर्न यहीं आया, जब इस पूरे घटनाक्रम के साथ जुड़ा वो वीडियो सामने आया, जिससे पूरा मामला साफ हुआ कि हकीकत में माजरा क्या था, किंतु तबतक कुछ देर हो चुकी थी, क्योंकि इस मामले की आड़ लेकर जातिगत व धार्मिक तनाव का जहर बोनेवाले अपना काम कर चुके थे, जिसकी वजह से मुखर्जी नगर थाने पर उस रात जमकर बवाल हुआ.
सवाल ये उठता है कि जब पूरा मामला साफ है कि किसी बात को लेकर टोकने पर टेम्पो ड्रायवर ने पुलिस पर तलवार निकाली, फिर भी पुलिस गलत कैसे?  पुलिस ने उसे रोकने की कोशिश की, फिर भी पुलिस गलत कैसे? एक पुलिसवाला अपनी जान पर खेल गया, बाल-बाल मरते-मरते बचा, लेकिन अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा,  फिर भी पुलिस गलत कैसे? कानून और व्यवस्था बनाए रखने सड़क पर तलवार लेकर दहशतगर्दी मचा रहे शख्स को पकड़ा,  फिर भी पुलिस गलत कैसे?
क्या पुलिस केवल इसलिए गलत हो गई कि कुछ लोग एक अपराधिक मानसिकतावाले व्यक्ति को बचाने के लिए भीड़ बनकर खड़े हो गये. आखिर कैसे और किसने इस पूरे मामले को धर्म और संप्रदाय या पंथ के साथ जोड़ दिया,जबकि इस पूरे मामले का आधार ये था ही नहीं. जिन पुलिसवालों ने अपनी ड्यूटी पूरी की, उनके ही खिलाफ कार्रवार्ई हो रही है और जो आदमी बलवा खड़ा करते हुए तनाव की स्थिति पैदा कर रहा है, उसके लिए हजारों लोग खड़े हो रहे हैं. क्या ऐसे बनेगी कानून और व्यवस्था की स्थिति?
मेरा सवाल अब भी बना हुआ है कि आखिर वो कौन लोग थे, जिन्होंने इसे जानबूझकर ऐसा रंग और मोड़ दिया, ताकि अपने काम से काम रखनेवाले और पूरी तरह शांतिप्रिय ढंग से समाजकारज करनेवाले सिखबांधव भड़कें, ये सवाल भले ही छोटा दिख रहा हो, लेकिन मेरी नजर में यही सवाल सबसे बड़ा सवाल है, और इस सवाल का जवाब इसी सोशल मीडिया पर उपलब्ध है. देखिए, खोजिए और सोचिए कि इन दिनों या पिछले कुछ दिनों से सिख समाज की समाजसेवा को लेकर खासतौर से कौन लोग पोस्ट शेयर कर रहे हैं, विशेषकर केरल की बाढ़ के बाद. सिख समाज हमेशा ही समाजसेवा और लंगरसेवा करता आया है, यही हमारे गुरूजनों की सीख भी है. इस घटना के तुरंत बाद सबसे पहले किन लोगों ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर धड़ा-धड़ पोस्ट करना शुरू किया और उन पोस्ट पर किस तरह तथा किन लोगों की कमेंट्स आई. आखिर हर बात में एक अलग ही रास्ता और विचारधारा लेकर चलनेवाले कुछ खास तरह के लोगों की अचानक सिख समुदाय को लेकर इतनी सहानुभूति व सांत्वना क्यों कर उमड़ रही है.
जवाब है, जवाब है साहब... जवाब है उसी रात सिख समुदाय के लोगों की भीड़ में मौजूद कुछ अलग किस्म की मानसिकता रखनेवाले लोगों द्वारा लगाए गये नारों में, जवाब है उस रात एसीपी स्तर के पुलिस अधिकारी के साथ की गई मारपीट में. जवाब है इस पूरी घटना के सभी तथ्यों के साफ हो जाने के बाद उन्हीं लोगों द्वारा अब साध ली गई चुप्पी में.ये चुप्पी ऐसे ही रहेगी, जब तक उन्हें ऐसा ही कोई अगला मौका नहीं मिल जाता. अब तय हमें और आपको करना है कि उन्हें ऐसा कोई मौका देना है, अथवा हमें किसी भी घटना के तथ्यों को लेकर सतर्क रहना है.

Wednesday, January 9, 2019



महज शख्स नहीं, मुकम्मल और मकबूल शख्सियत थे प्रो. एड. मीर अथहर अली

इस साल की पहली सुबह बड़ी मनहूस खबर लेकर आई, जब पता चला कि अपने आप में एक मुकम्मल शख्सियत कहे जा सकनेवाले प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब हमारे बीच नहीं रहे. जो आया है, वह जाएगा भी, ये संसार और प्रकृति का नियम है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका जाना बेहद अखर जाता है, क्योंकि उनके चले जाने से देश और समाज का काफी बड़ा नुकसान होता है, प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब भी कुछ इसी तरह की शख्सियत थे, जिनके जाने से मुस्लिम कौम के साथ ही देश और समाज का काफी नुकसान हुआ है, ऐसा कहा जा सकता है. 
वर्ष १९२४ में जन्मे प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब का बचपन अंजनगांव सुर्जी में गुजरा और बेहतर तालीम की ललक उन्हें अमरावती के मल्टीपर्पज हायस्कूल तक ले आई. साल १८७० में बनी मोहम्मडन हायस्कूल का नाम उस जमाने में मल्टीपर्पज हायस्कूल हो चुका था, जिसे आज हम और आप सायंसकोर हाईस्कूल के नाम से जानते हैं. ब्रिटीशराज के दौरान प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब की तालीम कई अंग्रेज शिक्षकों के जरिए हुई थी, जिसके चलते देखते ही देखते उन्होंने अंग्रेजी में शानदार महारत हासिल कर ली. साथ ही उस जमाने में उर्दू राजकाज की भाषा थी, यानि आम बोलचाल और दैनिक जीवन में उर्दू का प्रयोग जमकर होता था, अत: प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब भी उर्दू से अछूते नहीं थे और उन्होंने इस जबान में भी अपनी शानदार पकड़ हासिल की. यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब के वालिद डॉ. मीर गौहर अली उस जमाने में डॉक्टरी की तालीम हासिल थे, जिस जमाने में पढ़े-लिखे लोग इक्का-दुक्का मिला करते थे. ऐसे में घर से भी उन्हें पढऩे-लिखने को लेकर प्रोत्साहन मिला करता था, इसमें दो राय नहीं. 
* अंग्रेजी, उर्दू व पर्शियन में किया था एम.ए.
शालेय शिक्षा पूरी और पदवी हासिल करने के बाद प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने एक के बाद एक तीन बार एम. ए. किया और उर्दू व अंग्रेजी सहित पर्शियन भाषा में स्नातकोत्तर पदवी हासिल की. सबसे बड़ी बात ये है कि उन्होंने केवल इन भाषाओं में डिग्री ही हासिल नहीं की, बल्कि वे इन तीन भाषाओं में बड़े फर्राटे के साथ बात भी करते थे और किसी एक भाषा का प्रयोग करते समय उनसे किसी और भाषा की शब्दावली का प्रयोग नहीं करते थे. मौजूदा समय के खिचड़ी भाषाओं वाले दौर में तो शायद इस बात की कल्पना करना भी बेमानी है. ट्रिपल एमए करने के साथ ही प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने बी.टी. (बैचलर ऑफ टीचिंग) की पदवी हासिल की और महज २३ वर्ष की उम्र में बतौर शिक्षक अपने शानदार जीवन का आगाज किया. ये साल १९४३ था, जब देश बड़े भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था, जहां एक ओर देश में जंगे आजादी को लेकर हलचलें तेज थीं, वहीं दुसरे विश्वयुद्ध के बादल भी घने और काले हो रहे थे. इन सबके बीच मुल्क के बंटवारे के बीज भी बोए जा चुके थे, यानि हर तरफ अफरा-तफरी और संभ्रम का वातावरण. ऐसे वातावरण में प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब के बड़े और छोटे भाई ने बंटवारे के हालात में पाकिस्तान जाने का फैसला लिया, लेकिन प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने अपना मुल्क और अपने बुजूर्गों की मिट्टी को यह कहकर छोडऩे से इंकार कर दिया कि चाहे हम जीएं या मरें, लेकिन जो भी होगा, अपने मुल्क में होगा. प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब को जाननेवाले बताते हैं कि उस समय यदि वे पाकिस्तान गए होते, तो वहां उन्हें आला दर्जे की नौकरी मिली होती और वे शायद किसी यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर के रूप में रिटायर होते, क्योंकि तब पाकिस्तान के हालात बद से बदतर थे और वहां के हुक्मरानों को अपना मुल्क खड़ा करने के लिए शानदार तालीमयाफ्ता लोगों की सख्त जरूरत थी, जिसकी कसौटी पर प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब पूरी तरह से खरे उतरते थे. जिसकी वजह से बंटवारे के समय और बंटवारे के कुछ समय बाद तक प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब को पाकिस्तान की तरफ वहां चले आने की पेशकश मिलती रही, लेकिन वे हर बार ऐसी पेशकश को ठुकराते रहे.
तत्कालीन सीपी एंड बेरार यानि मध्यप्रांत के अकोला, सागर, जबलपुर जैसे अलग-अलग शहरों में महाविद्यालयों में बतौर प्राध्यापक सेवाएं देनेवाले प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने कालांतर में अचलपुर के जगदंबा महाविद्यालय, शिवाजी कला व वाणिज्य, शिवाजी सायंस और शिवाजी कृषि महाविद्यालय में भी अध्यापन का कार्य किया, जिसके बाद वर्ष १९८४ में वे सरकारी नियमानुसार सेवानिवृत्त हो गये. किंतु इस कालावधि में वे पढ़े-लिखे सुशिक्षितों की एक पूरी जमात खड़ी कर चुके थे, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा.
*रिटायरमेंट के बाद बने वकील
अमूमन लोग-बाद रिटायरमेंट को कार्यक्षम जीवन का अंत मान लेते हैं, किंतु यहां पर भी प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब सबसे अलग निकले. जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि उन्हें पढ़ऩे-पढ़ाने का शुरूआत से ही काफी शौक व रूझान रहा, तो पूरा जीवन विद्यार्थियों को पढ़ाने में बिताने के बाद प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब अपने रिटायरमेंट के बाद एकबार फिर विद्यार्थी की भूमिका में आ गए और उन्होंने एलएलबी करने की ना केवल ठानी, बल्कि ६५ वर्ष की आयु में शानदार अंकों के साथ एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए बाकायदा सनद भी हासिल की. प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब को जाननेवाले बताते हैं कि उन्हें अधिकारों और नियमों का उल्लंघन बेहद नापसंद था और ऐसा होने पर वे मामले को अदालत में खींचने से कोई गुरेज नहीं करते थे, चाहे फिर मसला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों ना ले जाना पड़े. उनका स्पष्ट मानना था कि अन्याय को किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जाना चाहिए. वे अपने आस-पास आम लोगों के मौलिक व मूलभूत अधिकारों का हनन होता देख व्यथित हो जाते थे और ऐसे लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए ही वे अपने रिटायरमेंट के बाद वकील बने थे. वकील बनने के बाद उन्होंने अमरावती सहित नागपुर हायकोर्ट व भोपाल हायकोर्ट के बार एसोसिएशन की सदस्यता हासिल की थी, जहां पर वे बाकायदा अलग-अलग मामलों की पेशी और जिरह के  लिए जाया भी करते थे. प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब की वकालत में सबसे बड़ी बात ये हुआ करती थी कि फीस लेना तो दूर, कई बार वे खुद अपने मुवक्कील की टायपिंग व अन्य छोटे-मोटे खर्चे अपनी जेब से दिया करते थे. आज के व्यावसायिक दौर में इस बात की भी कल्पना नहीं की जा सकती. ६५ वर्ष की आयु से शुरू हुआ इस अनोखी वकालत का सिलसिला अगले करीब २० साल तक चलता रहा और करीब ८५-८६ साल की उम्र में प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने कोर्ट जाना छोड़ दिया, हालांकि वे अपने घर पर बैठकर लोगों को नि:शुल्क तौर पर कानूनी मशविरा जरूर दिया करते थे. 
* सामाजिकता को दी अहमियत
इन सबसे बड़ी बात ये थी अपनी युवावस्था से ही प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब बड़े सामाजिक किस्म के व्यक्ति रहे और समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ कर गुजरने की भावना उनमें हमेशा बनी रही, जिसके तहत उन्होंने अपने समकक्षों के बच्चों को जहां यंग यूथ वेलफेयर एसो. बनाने प्रेरित किया, जिसके तहत कैम्प क्षेत्र में एक लायब्रेरी स्थापित की गई थी. इस लायब्रेरी में सभी बच्चे अपनी उपयोग में लाई जा चुकीं किताबें लाकर रखा करते थे, ताकि समाज के वंचित तबके के बच्चे उन किताबों के जरिए अपनी पढ़ाई कर सकें. वहीं प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब ने अपने ही जैसे लोगों को साथ लेकर फ्रेंड्स क्लब बनाया था, जिसके सदस्य समाज की विभिन्न जरूरतों पर ध्यान देते हुए उन जरूरतों को अपने हिसाब से पूरा करने पर विचार-विमर्श करने के साथ ही कुछ हद तक प्रयास भी किया करते थे. कुछ इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने देश की राजधानी नई दिल्ली में अथहर अली इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मैनेजमेंट नामक संस्था भी खोली, जो आज भी काम कर रही है. इस संस्था के जरिए आज तक अनेकों विद्यार्थी एमबीए, एमएचए व बीएचए की पदवी प्राप्त करके बाहर निकले हैं तथा हेल्थ व मैनेजमेंट के क्षेत्र में बेहतरीन पदों पर काम कर रहे हैं. समाजसेवा एवं परोपकार की यह भावना प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब के तीनों बेटों डॉ. शारीक अली, आसीफ अली व इरफान अली सहित उनकी बेटी में भी बखूबी उतरी है तथा अली साहब के चारों बच्चे अपने-अपने क्षेत्रों में इसी भावना के साथ काम कर रहे हैं.  
*पढऩे-पढ़ाने के साथ ही अपने शौक भी जिंदा रखे
ऐसा नहीं रहा कि प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब केवल किताबी ज्ञान या पढऩे-पढ़ाने तक ही सीमित रह गए. उन्हें फोटोग्राफी के साथ ही वॉलिबॉल व फुटबॉल खेलने का भी काफी शौक रहा. उनके फोटोग्राफी के शौक का अंदाजा तो केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू एक जनसभा में हिस्सा लेने नागपुर आए थे, तो प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब अमरावती से अपना कैमरा लेकर नागपुर केवल इस वजह से गए थे, ताकि वे पं. नेहरू की तस्वीर ले सकें. सबसे बड़ी बात ये रही कि उन्होंने अपने कैमरे से पं. नेहरू की एक-दो शानदार तस्वीरें ली भी, जो आज भी उनके एल्बम की शान बढ़ा रही हैं.
'ना ख्वाहिश की तमन्ना, ना सिला की परवाहÓ, मिर्जा गालिब के इस शेर को अपने जीवन में उसूल की तरह उतार चुके प्रो. एड. मीर अथहर अली साहब आज भले हमारे बीच हकीकी तौर पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन खुद आगे बढऩे के साथ ही औरों को भी आगे बढ़ाने को लेकर किए गए उनके काम और उनके विचार हमेशा हमारे साथ रहेंगे, इस बात में कोई संदेह नहीं. अल्लाहताला उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमाएं और उनकी रूह को मगफिरत अता फरमाएं, यही दुआ है. आमीन
चंद्रप्रकाश दुबे (सी.पी. दुबे 'असीम')


Monday, November 26, 2018


कहा जाता है कि जो कौमें (कृपया इसे किसी धर्म या मजबह से ना जोड़ें) अपने इतिहास से सबक नहीं लेतीं, इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता. आज 26/11 है, और आज से ठीक दस साल पहले एक ऐसा वाकया हुआ था, जिसने हमें ठिठक कर सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या हम इतने मजबूर और मजलूम हैं कि कोई भी चलता फिरता आए और हमारी बजाकर निकल ले. 26/11 का मुंबई टेरर अटैक इसलिए हुआ था, क्योंकि हमने इससे पहले हुए अक्षरधाम हमले और संसद पर हुए आक्रमण (वह हमला नहीं, हमारी संप्रभुता और गरिमा पर हुआ आक्रमण ही था) से कोई सबक शायद नहीं सीखा था. इसी वजह से षडयंत्रकारियों का हौसला बढ़ा और इसकी परिणिती मुंबई पर 26/11 के हमले के रूप में हुई.
मुंबई हमले पर विगत 10 वर्षों के दौरान काफी कुछ कहा व लिखा जा चुका है, अत: इसपर अलग से कुछ कहने या लिखने की यूं तो कोई जरूरत नहीं, किंतु मुझे उस हमले से ज्यादा उस हमले की आड़ लेकर देश के भीतर चले और पनपे षडयंत्र के घाव ज्यादा सालते हैं, जो सौभाग्य से सफल नहीं हो सका और ये षडयंत्र विफल हुआ था जांबाज पुलिस सिपाही तुकाराम ओंबले की शहादत के चलते, जिन्होंने आतंकी अबू अजमल उर्फ अजमल कसाब की एके-47 रायफल से निकली 26 गोलियां खाकर उसे जिंदा पकड़ा था.
सोचिए यदि उस दिन अन्य नौ आतंकियों की तरह ही आतंकी अबू अजमल उर्फ अजमल कसाब भी पुलिस या सेना की गोलियों से ढेर कर दिया जाता, तो क्या होता. जवाब इस पोस्ट के साथ शेयर की गई दूसरी फोटो में है, जिसमें कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह अपने हाथों में एक किताब लिए दिखाई दे रहे हैं (जरा दिग्गी राजा के चेहरे की मुस्कान पर ध्यान दीजिए, ऐसा लग रहा है मानों कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया है, या किसी खेल में वल्र्ड कप जीत कर आए हों जनाब).
खैर, मूल सवाल पर लौटते हैं कि यदि अजमल कसाब जिंदा ना पकड़ा जाता, तो क्या होता. जैसा कि दिग्गी राजा के हाथों में मौजूद किताब का शीर्षक है, आरएसएस की साजिश 26/11, इस किताब के जरिए ये कहने की कोशिश की गई थी कि आरएसएस यानि एक हिंदुत्ववादी संगठन ने हिंदुस्तान में अस्थिरता फैलाने के लिए 26/11 के हमले की योजना बनाई थी, इस जरिए कांग्रेस अपनी भगवा आतंकवाद की थ्योरी को साबित करने की जुगाड़ में थी, ऐसा कहा जा सकता है. 
बस यहीं पर और बिल्कुल यहीं पर मेरा सवाल उठता है कि जब जांच एजेंसियां तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी, तो कांग्रेस, दिग्गी राजा और इस किताब के लेखक कैसे इस नतीजे पर पहुंच गये थे कि हमले की साजिश किसने बनाई थी. क्या इसे निपट संयोग कहा जाए कि पाकिस्तान से आए दसों आतंकी युवक अपने साथ अपने हिंदू होने की निशानियां लेकर आए थे, जबकि वे हिंदु थे ही नहीं और उनका हिंदुत्व से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था. कैसे उनके हाथों में हिंदूओं की तरह सिद्धीविनायक का कलावा बंधा हुआ था और क्यों उनके पास हिंदु पहचान साबित करनेवाले पहचान पत्र थे. क्या आरएसएस इतना मूर्ख संगठन है कि पाकिस्तान के कुछ मुस्लिम युवकों को साथ लेकर एक आतंकी घटना को अंजाम देगा और उन्हें हिंदू भी साबित करेगा, ताकि खुद हिंदू ही कटघरे में खड़े किए जाएं.
तो आखिर क्यों आरएसएस या हिंदूवादी संगठन या कहें कि हिंदुओं को निशाने पर लिया जा रहा था एक ऐसी घटना के लिए, जिसका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं था. अजमल कसाब के जीवित पकड़े जाने और उससे हुई पूछताछ के बाद पूरा सच सामने आ जाने के बाद अब क्यों नहीं कांग्रेस से यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर उसके भगवा आतंकवाद की थ्योरी का सच क्या था और वह मुंबई हमले की आड़ में क्या हासिल करना चाह रही थी. ये पंक्तियां बेहद जिम्मेदारी के साथ लिख रहा हूं, क्योंकि इतना तो हम भी जानते हैं कि मुंबई बम ब्लास्ट, रघुनाथ मंदिर हमला, अक्षरधाम मंदिर हमला, भारतीय संसद पर हमला, ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके जैसी आतंकी वारदातें एकदम से अंजाम नहीं दी जाती, बल्कि इसके पीछे कई महीनों या कहें कि सालों-साल की माथा-पच्ची होती है. कब, कहां, कैसे, कौन के साथ ही उस वारदात के अपने हक में नफा-नुकसान का गणित भी तो होता होगा ना. आम जनता के लिए हर मामला भावनात्मक होता है, किंतु उपरी स्तर पर शायद भावनाओं के सोते सूख चुके होते हैं, वहां हर बात गणितात्मक होती है शायद... संभवतया लाशों के ढेर भी.
सवाल तो ये भी उठाया जा सकता है कि आखिर मुंबई पुलिस का ही एक जिम्मेदार अफसर बहादुर पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की शहादत पर व्हू किल्ड करकरे नामक किताब लिखकर आखिर क्या साबित करना चाह रहा था, क्योंकि जांच के दौरान बाकायदा उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी सामने आए, जिन्होंने उस घटना को अपनी आंखों के सामने घटते देखा और फिर जांच के दौरान करकरे के हत्यारे आतंकियों की पहचान की. तो इस शिनाख्ती के बाद उस अधिकारी से ये सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर वो क्या साबित करना चाहता था.
कुल मिलाकर लब्बो-लुआब ये है कि शहीद तुकाराम ओंबले की शहादत की वजह से कई लोगों की प्लानिंग धरी की धरी रह गई, वरना ये शायद ही कभी साबित हो पाता कि 26/11 के टेरर अटैक के पीछे पाकिस्तान का हाथ था. वैसे ये साबित करने के बाद भी हम अजमल कसाब को फांसी पर लटकाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सके हैं, यही हमने संसद पर हुए हमले के मामले में किया था, अफजल गुरू को फांसी पर लटका दिया और अपने कर्तव्य पूरे कर लिए. ये दोनों तो महज दो प्यादे थे, इनके आकाओं और हैंडलरों के गिरेबान अभी भी हमारी पकड़ से बहुत दूर हैं, और ऐसे आका सीमा के उस पार भी हैं, इस ओर भी हैं. किसी का नाम लेने की जरूरत ही नहीं, खुद इनकी हरकतें, करतूत और चरित्र इन्हें उजागर करने के लिए बेहद काफी हैं. जिन्हें तुरंत पता चल गया था कि मुंबई हमले के पीछे आरएसएस या भगवा आतंकी हैं, और यही लोग, बिल्कुल यही लोग इस हमले की असलियत और रंग उजागर होते ही चुप्पी साधकर बैठ गए. उनकी चुप्पी तब टूटी, जब आतंकी अजमल कसाब उर्फ अबू अजमल को फांसी पर लटकाया जाना तय हो गया, तब उसकी फांसी को राज्य प्रायोजित हत्या तक बता दिया गया. इससे अधिक हद क्या होगी?
ऐसे में मुंबई हमले को विफल करने में सभी बहादुरों की शहादत को नमन करते समय शहीद तुकाराम ओंबले की शहादत को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए, क्योंकि उनकी शहादत ने केवल एक हमले को ही विफल नहीं किया था, बल्कि इस हमले की आड़ में चल रहे एक भयानक षडयंत्र को भी विफल कर दिया था, एक ऐसा षडयंत्र जिसके तहत इस देश के बहुसंख्यक समुदाय को आतंकवादी या आतंकवाद को पोषक साबित किया जाना था, ताकि इसके राजनीतिक लाभ उठाए जा सकें. सोचिए यदि तुकाराम ओंबले के हाथों अजमल कसाब जीवित ना पकड़ा जाता तो क्या होता. तब शायद इस हमले की कहानी कुछ और होती, वो तो कतई ना होती, जो आज हम और आप जानते हैं.
इस देश का हर हिंदू और हिंदुत्व आपका कर्जदार रहेगा ओंबले जी, क्योंकि आपने हमें एक लज्जापूर्ण दाग से बचा लिया. सलाम आपकी शहादत को. और उन लोगों के लिए क्या कहा जाए, जो लाशों के ढेर पर अपने गणित बिठा रहे थे कि किसी भी तरह से उनकी तथाकथित थ्योरी को सही साबित किया जा सके, ये आप सुधीजन तय कर लें.

Tuesday, April 3, 2018

अभी हम एक भारत बंद से उबरे नहीं हैं कि अब एक और भारत बंद का ऐलान सुनाई दे रहा है. मजे की बात ये है कि अबकी बार वो लोग भारत बंद का समर्थन करते हुए तमाम सोशल मीडिया साईट्स पर संदेश फैला रहे हैं,  जो 2 अप्रैल के भारत बंद का पूरी तरह विरोध करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट के समर्थन में खड़े थे...  और अब खुद बंद करने पर उतारू हो रहे हैं.
आखिर क्या मिल जाएगा, इस एक और भारत बंद से,  क्यों करवाना है भारत बंद...  क्या वाकई एक दिन के भारत बंद से मिट जायेगी जातिगत आरक्षण की समस्या, या फिर हम भी शामिल हो जाएंगे नकलचियों की जमात में.
कुछ लोग तो चाहते ही हैं कि हम सब आपस में यूं ही लड़ते भिड़ते रहें,  ताकि ये देश यूं ही टुकड़े टुकड़े होता रहे.
आखिर किसी ने ये सोचने की जहमत उठाई क्या कि एक भारत बंद अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ था कि दूसरे भारत बंद का ऐलान कहां से आ गया.  कहने को ये अगला भारत बंद सवर्णों की ओर से किया गया आह्वान प्रतीत हो रहा है,  किंतु ऐसा है नहीं.
कुछ लोग अपनी मंशा को खुले आम भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाकर जाहिर कर चुके हैं और अब चल रहा है ट्रायल का खेल.
विगत जनवरी माह में महाराष्ट्र इसका दंश झेल चुका है,  और 3 जनवरी को महाराष्ट्र में ट्रायल सफल रहने के बाद 2 अप्रैल को इसका परीक्षण पूरे देश में किया गया. दोनों ही वक्त सामान्य श्रेणी वर्ग की ओर से टुकड़ेबाजों को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली,  हां इस बार भारत बंद के दौरान कई स्थानों पर सामान्यों ने कुछ प्रतिकार जरूर किया,  जिसे ध्यान में रखते हुए 10 अप्रैल का भारत बंद प्रायोजित किया जा रहा है,  ताकि बंद और बंद के दौरान होनेवाली हिंसा का ठीकरा सामान्यों पर फोड़ा जा सके. और यकीन जानिये हिंसा को अंजाम देने के लिए टोलियां तैयार बैठी हैं.  उनके एक नेता ने इशारों ही इशारों में कह भी दिया है कि भारत को सीरिया बनते देर नहीं लगेगी.  तो बात को समझिये और शांति से काम लीजिए.
जातिगत आरक्षण को लागू रखने या समाप्त करने का मामला सर्वोच्च अदालत व संसद का विषय है,  इसे सड़क पर उतरकर नहीं सुलझाया जा सकता है.
सामान्यों पर यूं भी आरोप कम नहीं हैं,  जो अब हम और धब्बे लगवाने जाएं. सो मेरी राय में इस बंद का कोई औचित्य नहीं है.
मैंने 2 अप्रैल के बंद का भी विरोध किया था और मैं 10 अप्रैल को होनेवाले बंद का भी विरोध करता हूँ,  क्योंकि ये देश मेरा है और मैं अपने देश का नुकसान नहीं कर सकता हूं.