अभी हम एक भारत बंद से उबरे नहीं हैं कि अब एक और भारत बंद का ऐलान सुनाई दे रहा है. मजे की बात ये है कि अबकी बार वो लोग भारत बंद का समर्थन करते हुए तमाम सोशल मीडिया साईट्स पर संदेश फैला रहे हैं, जो 2 अप्रैल के भारत बंद का पूरी तरह विरोध करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट के समर्थन में खड़े थे... और अब खुद बंद करने पर उतारू हो रहे हैं.
आखिर क्या मिल जाएगा, इस एक और भारत बंद से, क्यों करवाना है भारत बंद... क्या वाकई एक दिन के भारत बंद से मिट जायेगी जातिगत आरक्षण की समस्या, या फिर हम भी शामिल हो जाएंगे नकलचियों की जमात में.
कुछ लोग तो चाहते ही हैं कि हम सब आपस में यूं ही लड़ते भिड़ते रहें, ताकि ये देश यूं ही टुकड़े टुकड़े होता रहे.
आखिर किसी ने ये सोचने की जहमत उठाई क्या कि एक भारत बंद अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ था कि दूसरे भारत बंद का ऐलान कहां से आ गया. कहने को ये अगला भारत बंद सवर्णों की ओर से किया गया आह्वान प्रतीत हो रहा है, किंतु ऐसा है नहीं.
कुछ लोग अपनी मंशा को खुले आम भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाकर जाहिर कर चुके हैं और अब चल रहा है ट्रायल का खेल.
विगत जनवरी माह में महाराष्ट्र इसका दंश झेल चुका है, और 3 जनवरी को महाराष्ट्र में ट्रायल सफल रहने के बाद 2 अप्रैल को इसका परीक्षण पूरे देश में किया गया. दोनों ही वक्त सामान्य श्रेणी वर्ग की ओर से टुकड़ेबाजों को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली, हां इस बार भारत बंद के दौरान कई स्थानों पर सामान्यों ने कुछ प्रतिकार जरूर किया, जिसे ध्यान में रखते हुए 10 अप्रैल का भारत बंद प्रायोजित किया जा रहा है, ताकि बंद और बंद के दौरान होनेवाली हिंसा का ठीकरा सामान्यों पर फोड़ा जा सके. और यकीन जानिये हिंसा को अंजाम देने के लिए टोलियां तैयार बैठी हैं. उनके एक नेता ने इशारों ही इशारों में कह भी दिया है कि भारत को सीरिया बनते देर नहीं लगेगी. तो बात को समझिये और शांति से काम लीजिए.
जातिगत आरक्षण को लागू रखने या समाप्त करने का मामला सर्वोच्च अदालत व संसद का विषय है, इसे सड़क पर उतरकर नहीं सुलझाया जा सकता है.
सामान्यों पर यूं भी आरोप कम नहीं हैं, जो अब हम और धब्बे लगवाने जाएं. सो मेरी राय में इस बंद का कोई औचित्य नहीं है.
मैंने 2 अप्रैल के बंद का भी विरोध किया था और मैं 10 अप्रैल को होनेवाले बंद का भी विरोध करता हूँ, क्योंकि ये देश मेरा है और मैं अपने देश का नुकसान नहीं कर सकता हूं.
आखिर क्या मिल जाएगा, इस एक और भारत बंद से, क्यों करवाना है भारत बंद... क्या वाकई एक दिन के भारत बंद से मिट जायेगी जातिगत आरक्षण की समस्या, या फिर हम भी शामिल हो जाएंगे नकलचियों की जमात में.
कुछ लोग तो चाहते ही हैं कि हम सब आपस में यूं ही लड़ते भिड़ते रहें, ताकि ये देश यूं ही टुकड़े टुकड़े होता रहे.
आखिर किसी ने ये सोचने की जहमत उठाई क्या कि एक भारत बंद अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ था कि दूसरे भारत बंद का ऐलान कहां से आ गया. कहने को ये अगला भारत बंद सवर्णों की ओर से किया गया आह्वान प्रतीत हो रहा है, किंतु ऐसा है नहीं.
कुछ लोग अपनी मंशा को खुले आम भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाकर जाहिर कर चुके हैं और अब चल रहा है ट्रायल का खेल.
विगत जनवरी माह में महाराष्ट्र इसका दंश झेल चुका है, और 3 जनवरी को महाराष्ट्र में ट्रायल सफल रहने के बाद 2 अप्रैल को इसका परीक्षण पूरे देश में किया गया. दोनों ही वक्त सामान्य श्रेणी वर्ग की ओर से टुकड़ेबाजों को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली, हां इस बार भारत बंद के दौरान कई स्थानों पर सामान्यों ने कुछ प्रतिकार जरूर किया, जिसे ध्यान में रखते हुए 10 अप्रैल का भारत बंद प्रायोजित किया जा रहा है, ताकि बंद और बंद के दौरान होनेवाली हिंसा का ठीकरा सामान्यों पर फोड़ा जा सके. और यकीन जानिये हिंसा को अंजाम देने के लिए टोलियां तैयार बैठी हैं. उनके एक नेता ने इशारों ही इशारों में कह भी दिया है कि भारत को सीरिया बनते देर नहीं लगेगी. तो बात को समझिये और शांति से काम लीजिए.
जातिगत आरक्षण को लागू रखने या समाप्त करने का मामला सर्वोच्च अदालत व संसद का विषय है, इसे सड़क पर उतरकर नहीं सुलझाया जा सकता है.
सामान्यों पर यूं भी आरोप कम नहीं हैं, जो अब हम और धब्बे लगवाने जाएं. सो मेरी राय में इस बंद का कोई औचित्य नहीं है.
मैंने 2 अप्रैल के बंद का भी विरोध किया था और मैं 10 अप्रैल को होनेवाले बंद का भी विरोध करता हूँ, क्योंकि ये देश मेरा है और मैं अपने देश का नुकसान नहीं कर सकता हूं.