शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी देश की मूलभूत सुविधाओं में शामिल होने चाहिए, किंतु दुर्भाग्य से भारत इन दोनों की क्षेत्रों में बुरी तरह पिछड़ा हुआ है. या यूं कहें कि इन दोनों क्षेत्रों को निजी हाथों के जिम्मे सौंपकर आज तक की तमाम सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर एक तरह से लूट-खसोट को अनुमति दे दी है. जी हां, लूट-खसोट ही तो है. चाहे निजी स्कूलें हों या निजी अस्पताल व दवाखाने, आम आदमी की पहुंच से बेहद दूर हैं. वहीं इन्हीं आम आदमियों के लिए बनाए गये सरकारी स्कूलों और सरकारी दवाखानों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का कहीं पता नहीं. ऐसे में आम आदमी जाए, तो कहां जाए. ऐसे ही हालात में किसी समय मगध व पाटलिपुत्र जैसी समृद्ध राजसत्ता तथा तक्षशिला व नालंदा जैसे ज्ञानसंपन्न विश्वविद्यालयों के साक्षी रहे बिहार के मुजफ्फरपुर से दिल दहला देनेवाली ही नहीं, बल्कि आत्मा को झकझोर देनेवाली खबरें आती है, कि किसी चमकी नाम की बीमारी ने करीब डेढ़ सौ बच्चों से उनके जीवन की चमक छीन ली. हर ओर विलाप, हर मिनट एक मौत, हर मौत के बाद मौत, मौत दर मौत और केवल मौत.... उफ्फफ...
सब जानते हैं कि हमारे सरकारी अस्पतालों में क्या होता है, कई बार तो ये अस्पताल भ्रष्टाचार के खुले अड्डे बने होते हैं. दवाईयां यहां होती नहीं, लाखों-करोड़ों की मशीनरी या तो कागज पर आती है और अगर सच में आ भी गई, तो धूल खाती पड़ी रहती है, क्योंकि चलाना किसे आता है, जिसे आता है, वह या तो सही समय पर नहीं आता, या फिर नियुक्ति ही नहीं होती. मरीजों को नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था नहीं मिलती, इन अस्पतालों के शौचालयों और स्वच्छतागृहों का स्वछता से शायद ही कोई नाता होता है. आदि.. आदि.. इत्यादि... बहुत सी बातें हैं, मैं कोई नई बात नहीं बता रहा, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन ना कोई करता है, ना कोई कुछ कहता है.
हम जागते हैं और हड़बड़ाते हैं तब, जब कुछ बड़ा घटित होता है, जैसे कि अब मुजफ्फरपुर में हुआ. तब हम सवाल पूछते हैं कि फलां व्यक्ति कहां है, क्या कर रहा है, यहां ऐसा क्यों नहीं हुआ, यहां तो वैसा होना चाहिए था, आदि.. आदि.. इत्यादि. सबसे बुरी गत होती है हम मीडिया वालों की, ना पहुंचो, तो देखो मीडिया सो रहा है, पहुंच गये, तो देखो लाशों पर गिद्ध की तरह मंडराने चले आए. बोले तो हद है बस. (हालांकि देश के कुछ प्रतिष्ठित पत्रकार तब जागे, जब उन्हें लगा कि दूसरे पत्रकार इस खबर को लेकर टीआरपी में उनसे आगे निकल रहे हैं और इसके बाद मुजफ्फरपुर ने मौत के नंगे नाच के साथ ही स्तरहीन तथा गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता को भी देखा, जिसके लिए मीडिया जगत की हर ओर जबरदस्त किरकिरी हुई.
मुजफ्फरपुर मामले में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम जी द्वारा कवर की गई न्यूज में मैं एक डाक्टर की बात सुन रहा था, उस डाक्टर की बदहवासी पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो. डाक्टर साहब अपने इर्द-गिर्द हो रही मौतों से निश्चित ही हैरान-परेशान थे, उन्हें स्पष्ट रूप से कहते हुए सुना जा सकता है कि हमारे पास स्टाफ की कमी है, हमारे पास आवश्यक दवाईयां नहीं है, लेकिन हम अपने पास उपलब्ध साधनों के जरिए भी हर एक बच्चे की जान बचाने की कोशिश में लगे हैं. उन डाक्टर साहब का ये कहते हुए गला रूंध गया था कि सर हम बिना कुछ खाए-पिए काम में लगे हैं, पर क्या करें हमारी भी कुछ सीमा है. हर बात के लिए डाक्टरों का गिरहबान पकडऩेवालों कभी जाकर उन खद्दरधारियों का गिरहबान भी पकड़ो, कभी जाकर उन बड़े-बड़े अफसरान का गिरहबान भी पकड़ो, जिनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे हर एक सरकारी अस्पताल को तमाम जरूरी सुविधाओं से लैस रखें. सांप निकल जाने पर लाठी पीटने से ज्यादा ठीक रहेगा ये शायद. हालांकि इस मामले में एक के बाद एक शानदार कवरेज करने और प्रेसवार्ता में केंद्रीय व राज्य स्वास्थ्य मंत्री को जमकर घेरने के बाद खुद को मिलती प्रशंसा व सफलता के बाद अंजीत अंजुम जी तब भटक गये, जब उन्होंने मृतक बच्चों की गिनती जातिगत स्तर पर करनी शुरू कर दी. ये भी हमारे देश की एक प्रमुख समस्या है, कि हम हर बात में जाति और धर्म देखते ही देखते हैं.
मेरी संवेदनाएं मुजफ्फरपुर के तमाम पीडि़त परिवारों के साथ हैं. साथ ही मेरा गुस्सा उन तमाम लोगों के खिलाफ है, जो इन बच्चों की चिताओं पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकना चाहते हैं और इन मौतों को एक अपने लिए मौकों के रूप में देख रहे हैं. ऐसे लोगों को अपने इंसान होने पर शर्म आनी चाहिए. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि विगत कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि मुजफ्फरपुर सहित कुछ खास घटनाओं पर कुछ खास किस्म के लोग संवेदना जताने की आड़ में या सहानुभूति जताने के नाम पर जले पर नमक छिड़कने तथा जख्मों को कुरेदने का काम कर रहे हैं. साथ ही कुछ लोगों ने तो इसमें भी जाति और धर्म की बात ढूंढ ली. मतलब हद ही है.
यहां पर भी मेरा एक सवाल है कि अगर लीची नामक फल से ही चमकी का बुखार फैला, तो ऐसा इन तमाम शहरों में क्यों नहीं हुआ, जहां लीची खाई जाती है, कहीं मुजफ्फरपुर की लीची में कोई लोचा तो नहीं. मुजफ्फरपुर को एक सबक की तरह लिया जाना चाहिए. सभी जिलों में सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली को मुस्तैद किया जाना बेहद जरूरी है, ताकि कोई भी आपात या ऐसी स्थिति उपजने पर उससे तत्काल निपटा जा सके. याद रखें कि मौत कभी किसी के घर बताकर नहीं आती. गरीबों के इलाज का पैसा खानेवालों को ये ध्यान में रखना चाहिए कि सभी की तरह बच्चे उनके घर में भी होंगे और लीची जरूर खाते होंगे, भगवान ना करे कि कभी कुछ..... खुदा खैर करे.
सब जानते हैं कि हमारे सरकारी अस्पतालों में क्या होता है, कई बार तो ये अस्पताल भ्रष्टाचार के खुले अड्डे बने होते हैं. दवाईयां यहां होती नहीं, लाखों-करोड़ों की मशीनरी या तो कागज पर आती है और अगर सच में आ भी गई, तो धूल खाती पड़ी रहती है, क्योंकि चलाना किसे आता है, जिसे आता है, वह या तो सही समय पर नहीं आता, या फिर नियुक्ति ही नहीं होती. मरीजों को नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था नहीं मिलती, इन अस्पतालों के शौचालयों और स्वच्छतागृहों का स्वछता से शायद ही कोई नाता होता है. आदि.. आदि.. इत्यादि... बहुत सी बातें हैं, मैं कोई नई बात नहीं बता रहा, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन ना कोई करता है, ना कोई कुछ कहता है.
हम जागते हैं और हड़बड़ाते हैं तब, जब कुछ बड़ा घटित होता है, जैसे कि अब मुजफ्फरपुर में हुआ. तब हम सवाल पूछते हैं कि फलां व्यक्ति कहां है, क्या कर रहा है, यहां ऐसा क्यों नहीं हुआ, यहां तो वैसा होना चाहिए था, आदि.. आदि.. इत्यादि. सबसे बुरी गत होती है हम मीडिया वालों की, ना पहुंचो, तो देखो मीडिया सो रहा है, पहुंच गये, तो देखो लाशों पर गिद्ध की तरह मंडराने चले आए. बोले तो हद है बस. (हालांकि देश के कुछ प्रतिष्ठित पत्रकार तब जागे, जब उन्हें लगा कि दूसरे पत्रकार इस खबर को लेकर टीआरपी में उनसे आगे निकल रहे हैं और इसके बाद मुजफ्फरपुर ने मौत के नंगे नाच के साथ ही स्तरहीन तथा गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता को भी देखा, जिसके लिए मीडिया जगत की हर ओर जबरदस्त किरकिरी हुई.
मुजफ्फरपुर मामले में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम जी द्वारा कवर की गई न्यूज में मैं एक डाक्टर की बात सुन रहा था, उस डाक्टर की बदहवासी पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो. डाक्टर साहब अपने इर्द-गिर्द हो रही मौतों से निश्चित ही हैरान-परेशान थे, उन्हें स्पष्ट रूप से कहते हुए सुना जा सकता है कि हमारे पास स्टाफ की कमी है, हमारे पास आवश्यक दवाईयां नहीं है, लेकिन हम अपने पास उपलब्ध साधनों के जरिए भी हर एक बच्चे की जान बचाने की कोशिश में लगे हैं. उन डाक्टर साहब का ये कहते हुए गला रूंध गया था कि सर हम बिना कुछ खाए-पिए काम में लगे हैं, पर क्या करें हमारी भी कुछ सीमा है. हर बात के लिए डाक्टरों का गिरहबान पकडऩेवालों कभी जाकर उन खद्दरधारियों का गिरहबान भी पकड़ो, कभी जाकर उन बड़े-बड़े अफसरान का गिरहबान भी पकड़ो, जिनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे हर एक सरकारी अस्पताल को तमाम जरूरी सुविधाओं से लैस रखें. सांप निकल जाने पर लाठी पीटने से ज्यादा ठीक रहेगा ये शायद. हालांकि इस मामले में एक के बाद एक शानदार कवरेज करने और प्रेसवार्ता में केंद्रीय व राज्य स्वास्थ्य मंत्री को जमकर घेरने के बाद खुद को मिलती प्रशंसा व सफलता के बाद अंजीत अंजुम जी तब भटक गये, जब उन्होंने मृतक बच्चों की गिनती जातिगत स्तर पर करनी शुरू कर दी. ये भी हमारे देश की एक प्रमुख समस्या है, कि हम हर बात में जाति और धर्म देखते ही देखते हैं.
मेरी संवेदनाएं मुजफ्फरपुर के तमाम पीडि़त परिवारों के साथ हैं. साथ ही मेरा गुस्सा उन तमाम लोगों के खिलाफ है, जो इन बच्चों की चिताओं पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकना चाहते हैं और इन मौतों को एक अपने लिए मौकों के रूप में देख रहे हैं. ऐसे लोगों को अपने इंसान होने पर शर्म आनी चाहिए. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि विगत कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि मुजफ्फरपुर सहित कुछ खास घटनाओं पर कुछ खास किस्म के लोग संवेदना जताने की आड़ में या सहानुभूति जताने के नाम पर जले पर नमक छिड़कने तथा जख्मों को कुरेदने का काम कर रहे हैं. साथ ही कुछ लोगों ने तो इसमें भी जाति और धर्म की बात ढूंढ ली. मतलब हद ही है.
यहां पर भी मेरा एक सवाल है कि अगर लीची नामक फल से ही चमकी का बुखार फैला, तो ऐसा इन तमाम शहरों में क्यों नहीं हुआ, जहां लीची खाई जाती है, कहीं मुजफ्फरपुर की लीची में कोई लोचा तो नहीं. मुजफ्फरपुर को एक सबक की तरह लिया जाना चाहिए. सभी जिलों में सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली को मुस्तैद किया जाना बेहद जरूरी है, ताकि कोई भी आपात या ऐसी स्थिति उपजने पर उससे तत्काल निपटा जा सके. याद रखें कि मौत कभी किसी के घर बताकर नहीं आती. गरीबों के इलाज का पैसा खानेवालों को ये ध्यान में रखना चाहिए कि सभी की तरह बच्चे उनके घर में भी होंगे और लीची जरूर खाते होंगे, भगवान ना करे कि कभी कुछ..... खुदा खैर करे.

