Monday, November 26, 2018


कहा जाता है कि जो कौमें (कृपया इसे किसी धर्म या मजबह से ना जोड़ें) अपने इतिहास से सबक नहीं लेतीं, इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता. आज 26/11 है, और आज से ठीक दस साल पहले एक ऐसा वाकया हुआ था, जिसने हमें ठिठक कर सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या हम इतने मजबूर और मजलूम हैं कि कोई भी चलता फिरता आए और हमारी बजाकर निकल ले. 26/11 का मुंबई टेरर अटैक इसलिए हुआ था, क्योंकि हमने इससे पहले हुए अक्षरधाम हमले और संसद पर हुए आक्रमण (वह हमला नहीं, हमारी संप्रभुता और गरिमा पर हुआ आक्रमण ही था) से कोई सबक शायद नहीं सीखा था. इसी वजह से षडयंत्रकारियों का हौसला बढ़ा और इसकी परिणिती मुंबई पर 26/11 के हमले के रूप में हुई.
मुंबई हमले पर विगत 10 वर्षों के दौरान काफी कुछ कहा व लिखा जा चुका है, अत: इसपर अलग से कुछ कहने या लिखने की यूं तो कोई जरूरत नहीं, किंतु मुझे उस हमले से ज्यादा उस हमले की आड़ लेकर देश के भीतर चले और पनपे षडयंत्र के घाव ज्यादा सालते हैं, जो सौभाग्य से सफल नहीं हो सका और ये षडयंत्र विफल हुआ था जांबाज पुलिस सिपाही तुकाराम ओंबले की शहादत के चलते, जिन्होंने आतंकी अबू अजमल उर्फ अजमल कसाब की एके-47 रायफल से निकली 26 गोलियां खाकर उसे जिंदा पकड़ा था.
सोचिए यदि उस दिन अन्य नौ आतंकियों की तरह ही आतंकी अबू अजमल उर्फ अजमल कसाब भी पुलिस या सेना की गोलियों से ढेर कर दिया जाता, तो क्या होता. जवाब इस पोस्ट के साथ शेयर की गई दूसरी फोटो में है, जिसमें कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह अपने हाथों में एक किताब लिए दिखाई दे रहे हैं (जरा दिग्गी राजा के चेहरे की मुस्कान पर ध्यान दीजिए, ऐसा लग रहा है मानों कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया है, या किसी खेल में वल्र्ड कप जीत कर आए हों जनाब).
खैर, मूल सवाल पर लौटते हैं कि यदि अजमल कसाब जिंदा ना पकड़ा जाता, तो क्या होता. जैसा कि दिग्गी राजा के हाथों में मौजूद किताब का शीर्षक है, आरएसएस की साजिश 26/11, इस किताब के जरिए ये कहने की कोशिश की गई थी कि आरएसएस यानि एक हिंदुत्ववादी संगठन ने हिंदुस्तान में अस्थिरता फैलाने के लिए 26/11 के हमले की योजना बनाई थी, इस जरिए कांग्रेस अपनी भगवा आतंकवाद की थ्योरी को साबित करने की जुगाड़ में थी, ऐसा कहा जा सकता है. 
बस यहीं पर और बिल्कुल यहीं पर मेरा सवाल उठता है कि जब जांच एजेंसियां तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी, तो कांग्रेस, दिग्गी राजा और इस किताब के लेखक कैसे इस नतीजे पर पहुंच गये थे कि हमले की साजिश किसने बनाई थी. क्या इसे निपट संयोग कहा जाए कि पाकिस्तान से आए दसों आतंकी युवक अपने साथ अपने हिंदू होने की निशानियां लेकर आए थे, जबकि वे हिंदु थे ही नहीं और उनका हिंदुत्व से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था. कैसे उनके हाथों में हिंदूओं की तरह सिद्धीविनायक का कलावा बंधा हुआ था और क्यों उनके पास हिंदु पहचान साबित करनेवाले पहचान पत्र थे. क्या आरएसएस इतना मूर्ख संगठन है कि पाकिस्तान के कुछ मुस्लिम युवकों को साथ लेकर एक आतंकी घटना को अंजाम देगा और उन्हें हिंदू भी साबित करेगा, ताकि खुद हिंदू ही कटघरे में खड़े किए जाएं.
तो आखिर क्यों आरएसएस या हिंदूवादी संगठन या कहें कि हिंदुओं को निशाने पर लिया जा रहा था एक ऐसी घटना के लिए, जिसका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं था. अजमल कसाब के जीवित पकड़े जाने और उससे हुई पूछताछ के बाद पूरा सच सामने आ जाने के बाद अब क्यों नहीं कांग्रेस से यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर उसके भगवा आतंकवाद की थ्योरी का सच क्या था और वह मुंबई हमले की आड़ में क्या हासिल करना चाह रही थी. ये पंक्तियां बेहद जिम्मेदारी के साथ लिख रहा हूं, क्योंकि इतना तो हम भी जानते हैं कि मुंबई बम ब्लास्ट, रघुनाथ मंदिर हमला, अक्षरधाम मंदिर हमला, भारतीय संसद पर हमला, ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके जैसी आतंकी वारदातें एकदम से अंजाम नहीं दी जाती, बल्कि इसके पीछे कई महीनों या कहें कि सालों-साल की माथा-पच्ची होती है. कब, कहां, कैसे, कौन के साथ ही उस वारदात के अपने हक में नफा-नुकसान का गणित भी तो होता होगा ना. आम जनता के लिए हर मामला भावनात्मक होता है, किंतु उपरी स्तर पर शायद भावनाओं के सोते सूख चुके होते हैं, वहां हर बात गणितात्मक होती है शायद... संभवतया लाशों के ढेर भी.
सवाल तो ये भी उठाया जा सकता है कि आखिर मुंबई पुलिस का ही एक जिम्मेदार अफसर बहादुर पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की शहादत पर व्हू किल्ड करकरे नामक किताब लिखकर आखिर क्या साबित करना चाह रहा था, क्योंकि जांच के दौरान बाकायदा उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी सामने आए, जिन्होंने उस घटना को अपनी आंखों के सामने घटते देखा और फिर जांच के दौरान करकरे के हत्यारे आतंकियों की पहचान की. तो इस शिनाख्ती के बाद उस अधिकारी से ये सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर वो क्या साबित करना चाहता था.
कुल मिलाकर लब्बो-लुआब ये है कि शहीद तुकाराम ओंबले की शहादत की वजह से कई लोगों की प्लानिंग धरी की धरी रह गई, वरना ये शायद ही कभी साबित हो पाता कि 26/11 के टेरर अटैक के पीछे पाकिस्तान का हाथ था. वैसे ये साबित करने के बाद भी हम अजमल कसाब को फांसी पर लटकाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सके हैं, यही हमने संसद पर हुए हमले के मामले में किया था, अफजल गुरू को फांसी पर लटका दिया और अपने कर्तव्य पूरे कर लिए. ये दोनों तो महज दो प्यादे थे, इनके आकाओं और हैंडलरों के गिरेबान अभी भी हमारी पकड़ से बहुत दूर हैं, और ऐसे आका सीमा के उस पार भी हैं, इस ओर भी हैं. किसी का नाम लेने की जरूरत ही नहीं, खुद इनकी हरकतें, करतूत और चरित्र इन्हें उजागर करने के लिए बेहद काफी हैं. जिन्हें तुरंत पता चल गया था कि मुंबई हमले के पीछे आरएसएस या भगवा आतंकी हैं, और यही लोग, बिल्कुल यही लोग इस हमले की असलियत और रंग उजागर होते ही चुप्पी साधकर बैठ गए. उनकी चुप्पी तब टूटी, जब आतंकी अजमल कसाब उर्फ अबू अजमल को फांसी पर लटकाया जाना तय हो गया, तब उसकी फांसी को राज्य प्रायोजित हत्या तक बता दिया गया. इससे अधिक हद क्या होगी?
ऐसे में मुंबई हमले को विफल करने में सभी बहादुरों की शहादत को नमन करते समय शहीद तुकाराम ओंबले की शहादत को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए, क्योंकि उनकी शहादत ने केवल एक हमले को ही विफल नहीं किया था, बल्कि इस हमले की आड़ में चल रहे एक भयानक षडयंत्र को भी विफल कर दिया था, एक ऐसा षडयंत्र जिसके तहत इस देश के बहुसंख्यक समुदाय को आतंकवादी या आतंकवाद को पोषक साबित किया जाना था, ताकि इसके राजनीतिक लाभ उठाए जा सकें. सोचिए यदि तुकाराम ओंबले के हाथों अजमल कसाब जीवित ना पकड़ा जाता तो क्या होता. तब शायद इस हमले की कहानी कुछ और होती, वो तो कतई ना होती, जो आज हम और आप जानते हैं.
इस देश का हर हिंदू और हिंदुत्व आपका कर्जदार रहेगा ओंबले जी, क्योंकि आपने हमें एक लज्जापूर्ण दाग से बचा लिया. सलाम आपकी शहादत को. और उन लोगों के लिए क्या कहा जाए, जो लाशों के ढेर पर अपने गणित बिठा रहे थे कि किसी भी तरह से उनकी तथाकथित थ्योरी को सही साबित किया जा सके, ये आप सुधीजन तय कर लें.

Tuesday, April 3, 2018

अभी हम एक भारत बंद से उबरे नहीं हैं कि अब एक और भारत बंद का ऐलान सुनाई दे रहा है. मजे की बात ये है कि अबकी बार वो लोग भारत बंद का समर्थन करते हुए तमाम सोशल मीडिया साईट्स पर संदेश फैला रहे हैं,  जो 2 अप्रैल के भारत बंद का पूरी तरह विरोध करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट के समर्थन में खड़े थे...  और अब खुद बंद करने पर उतारू हो रहे हैं.
आखिर क्या मिल जाएगा, इस एक और भारत बंद से,  क्यों करवाना है भारत बंद...  क्या वाकई एक दिन के भारत बंद से मिट जायेगी जातिगत आरक्षण की समस्या, या फिर हम भी शामिल हो जाएंगे नकलचियों की जमात में.
कुछ लोग तो चाहते ही हैं कि हम सब आपस में यूं ही लड़ते भिड़ते रहें,  ताकि ये देश यूं ही टुकड़े टुकड़े होता रहे.
आखिर किसी ने ये सोचने की जहमत उठाई क्या कि एक भारत बंद अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ था कि दूसरे भारत बंद का ऐलान कहां से आ गया.  कहने को ये अगला भारत बंद सवर्णों की ओर से किया गया आह्वान प्रतीत हो रहा है,  किंतु ऐसा है नहीं.
कुछ लोग अपनी मंशा को खुले आम भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाकर जाहिर कर चुके हैं और अब चल रहा है ट्रायल का खेल.
विगत जनवरी माह में महाराष्ट्र इसका दंश झेल चुका है,  और 3 जनवरी को महाराष्ट्र में ट्रायल सफल रहने के बाद 2 अप्रैल को इसका परीक्षण पूरे देश में किया गया. दोनों ही वक्त सामान्य श्रेणी वर्ग की ओर से टुकड़ेबाजों को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली,  हां इस बार भारत बंद के दौरान कई स्थानों पर सामान्यों ने कुछ प्रतिकार जरूर किया,  जिसे ध्यान में रखते हुए 10 अप्रैल का भारत बंद प्रायोजित किया जा रहा है,  ताकि बंद और बंद के दौरान होनेवाली हिंसा का ठीकरा सामान्यों पर फोड़ा जा सके. और यकीन जानिये हिंसा को अंजाम देने के लिए टोलियां तैयार बैठी हैं.  उनके एक नेता ने इशारों ही इशारों में कह भी दिया है कि भारत को सीरिया बनते देर नहीं लगेगी.  तो बात को समझिये और शांति से काम लीजिए.
जातिगत आरक्षण को लागू रखने या समाप्त करने का मामला सर्वोच्च अदालत व संसद का विषय है,  इसे सड़क पर उतरकर नहीं सुलझाया जा सकता है.
सामान्यों पर यूं भी आरोप कम नहीं हैं,  जो अब हम और धब्बे लगवाने जाएं. सो मेरी राय में इस बंद का कोई औचित्य नहीं है.
मैंने 2 अप्रैल के बंद का भी विरोध किया था और मैं 10 अप्रैल को होनेवाले बंद का भी विरोध करता हूँ,  क्योंकि ये देश मेरा है और मैं अपने देश का नुकसान नहीं कर सकता हूं.

Wednesday, March 28, 2018

वो कहते हैं हम धर्म की राजनीति नहीं करते,  बावजूद इसके वो तमाम धर्मस्थलों पर घूमते रहते हैं.
शायद वो सही ही कहते हैं कि वो धर्म की राजनीति नहीं करते...  क्योंकि वो राजनीति के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हैं...
और शायद उनका इस्तेमाल ही सही है, क्योंकि कोई दूसरा अगर ऐसा करे,  तो ये ही उस पर धार्मिक कट्टरता फैलाने का आरोप भी लगाते हैं.

ऐसे में मेरी राय ये है कि तमाम नेताओं को चुनावी माहौल में किसी भी धर्म के धार्मिक स्थलों की यात्रा करने से मना किया जाए, और निर्वाचन आयोग इस बात को आदर्श चुनावी आचार संहिता में शामिल करे,  क्योंकि इससे वोट बैंक प्रभावित होता है.
सभी धर्म आदर्श जीवन पद्धति का मार्ग हैं,  कोई राजनीतिक दलों की बपौती नहीं,  कि चुनावी मौसम में आए,  और फसल काटकर चलते बने.